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वसुधैव कुटुम्बकम् ()
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भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान है, जबकि पाश्चात्य संस्कृति को भौतिक प्रधान माना जाता है। अध्यात्म प्रधान संस्कृति से तात्पर्य अभौतिकतावादी दृष्टिकोण को अत्यधिक महत्त्व मिलने से है। प्रचीनकाल से ही वसुधैव कुटुम्बकम् और अतिथि देवो भवः के सिद्धांतों में रची-बसी भारतीय संस्कृति में विश्वास, भावना, आस्था, धर्म रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का अत्यधिक महत्त्व रहा है। धर्म प्रधान संस्कृति होने के कारण ही लोगों ने इसे अध्यात्म प्रधान संस्कृति माना है। रामकृष्ण परमहंस क शब्दों में ईश्वरत्व और त्याग पर्यायवाची शब्द हैं। संस्कृति और सदाचार उसकी बाह्य अभिव्यक्तियाँ हैं। परंपरागत दृष्टिकोण के अंतर्गत हम अपने धार्मिक अर्थात् आध्यात्मिक दर्शन को लेकर बहुत हद तक अतीत के प्रति महिमामंडित भाव रखते हैं, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर हमें इस तथ्य का मूल्यांकन करना चाहिए कि 21वीं सदी में भी क्या 5वीं सदी की मान्यताओं को जारी रखा जा सकता है? आज जब दुनिया विज्ञान की निरंतर तीव्र प्रगति के बल पर चाँद तो क्या सूर्य को भी खंगालने की कोशिश कर रही है, मानव का क्लोन बनाकर ईश्वर की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश कर रही है, तो क्या इन परिस्थितियों में धर्म या आध्यात्मिकता को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देना प्रासंगिक एवं बुद्धिमानीपूर्ण है? पाश्चात्य संस्कृति भौतिकता प्रधान और वैज्ञानिक संस्कृति है। भौतिकता प्रधान संस्कृति से तात्पर्य ऐसी संस्कृति से है, जो यथार्थवादी दृष्टिकोण को अधिक महत्त्व देती है। भौतिक का सामान्य अर्थ देखने या इंद्रियबोध से साक्षात संबंध रखने वाली वस्तु से है, अर्थात् जो यथार्थ एवं वास्तविक हो। पाश्चात्य संस्कृति को इसलिए वैज्ञानिक माना जाता है, क्योंकि इसमें जांच-पड़ताल की मूल्यांकन पद्धति अपनाकर एक सामान्य सिद्धांत या नियम बनाया जाता है, जिसके आधार पर भविष्यवाणी की जा सके और व्यक्ति एवं समाज की जीवन-शैली को बेहतर बनाया जा सके। एक ओर भारतीय समाज पर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव पड़ रहा है, तो दूसरी ओर यह हमारे लिए हितकारी भी साबित हो रही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण हममें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना कम होती जा रही है। संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन हो रहा है। पारिवारिक जीवन तनावपूर्ण एवं संघर्षपूर्ण हो गया है। पाश्चात्य संस्कृति कि नकल के कारण लोग स्वतंत्र होकर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं, परिणामस्वरूप वैवाहिक संबंधों में सुदृढ़ता एवं आत्मीयता का अभाव उत्पन्न हो गया है। संयुक्त परिवार में वैवाहिक संबंधों को टूटने से बचाने के लिए जो पारिवारिक पृष्ठभूमि होती है, वर्तमान के एकल या नाभिक परिवारों में उसका अभाव है। इस कारण विवाह विच्छेद की समस्या में वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह जैसे मामलों में वृद्धि हुई है। पाश्चात्य प्रभाव के कारण व्यक्तित्व के विकास में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, विशेषकर महिलाओं के व्यक्तित्व के विकास में। शिक्षा के प्रसार ने उन्हें अधिक महत्वाकांक्षी एवं आत्मविश्वासी बना दिया है। उनमें आत्मनिर्भरता की भावना का अत्यधिक विस्तार होने से परिवार की बेड़ियों में जकड़ी हुई घर की चहारदीवारी में कैद थीं, अब पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने लगी हैं।आजकल पाशचात्यीकरण को आधुनिकीकरण समझने की भूल की जा रही है, जो एक बड़ी समस्या है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पाश्चात्यीकरण एवं आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ सिद्धांततः भिन्न हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कुछ भिन्नताएँ होने के बाद भी उनमें काफी समानताएं हैं। सरल शब्दों में कहें, तो भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिमीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही प्रारम्भ होती है। पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण किया जाता है, जिसमें आधुनिक मूल्यों के साथ-साथ कुछ रूढ़िवादी परम्पराएँ भी शामिल रहती हैं, जबकि आधुनिकीकरण का अर्थ है-आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना एवं उसके अनुरूप व्यवहार करना। इस तरह पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत आँखें मूँदकर पाश्चात्य देशों की संस्कृति का अनुकरण नहीं किया जाता।यही कारण है कि पश्चिमीकरण के अन्तर्गत मौजूद आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना तो तार्किक एवं उपयुक्त लगता है, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के अन्य तत्त्वों का अन्धानुकरण अनुचित, किन्तु पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने की होड़ में हम अपनी भाषा, संस्कृति. वेशभूषा, रहन-सहन, कला-विज्ञान, साहित्य आदि सभी कुछ भूल गए हैं। सचमुच आज पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण करने वाले भारतवासियों को मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। यह ठीक है, पश्चिम बहुत ही कर रहा उत्कर्ष है, पर पूर्व-गुरु उसका यही पुरु वृद्ध भारतवर्ष है।इन सबके बावजूद आज हमने आधुनिकता की दौड़ में आर्थिक के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अत्यंत प्रगति की है। शिक्षा का प्रसार, संचार साधनों का विकास, भौतिकवादी संस्कृति का प्रचार आदि कारकों ने रूढ़िग्रस्त परंपरागत भारतीय आदर्शों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए हैं, जिनके फलस्वरूप रूढ़िग्रस्त, आडम्बरपूर्ण एवं अतार्किक धर्म के प्रति लोगों का लगाव कम होता जा रहा है। अधिकांश लोग अब भाग्य की अपेक्षा कर्म पर विश्वास करने लगे हैं। आधुनिकता आज समय की माँग है, लेकिन इसी के साथ-साथ भौतिकवादी दृष्टिकोण ने लोगों को यांत्रिक बना दिया है। संवेदनाएं, प्रेम, आत्मीयता एवं आमने-सामने के स्नेहपूर्ण संबंध समाप्त होते जा रहे हैं परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन नीरस एवं अर्थविहीन होता जा रहा है।इसी कारण आज आवश्यकता भारतीय संस्कृति की परंपराओं को सहेजकर रखने के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति के आधुनिक मूल्यों को आत्मसात् करने की है। पारंपरिकता आधुनिकता को आधार प्रदान करती है, उसे शुष्क नीरस एवं बुद्धि विलासी बनने से बचाती है, मानवीय व्यवहार को एक सम्यक् अर्थ प्रदान करती है।भारतीय संस्कृति की परंपराएं हमें अपने भारतीय होने का अहसास कराती हैं, जो हमें विश्व के अन्य देशों से विकास की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय संस्कृति की अनेक परंपराएं ऐसी हैं, जो सामाजिक जीवन को अधिक सरस एवं आत्मीय बनाए रखने में योगदान करती हैं, जिससे मनुष्य की तरह जीवन जिया जा सकता है, यंत्र की तरह नहीं। वहीं पाश्चात्य संस्कृति की अनेक विशेषताएं हमारे विचारों को अधिक तार्किक एवं बौद्धिक बनाती हैं, जिन्हें हम अपने व्यवहार में क्रियान्वित कर मनुष्य जीवन को अधिक सार्थक बना सकते हैं।
भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान है, जबकि पाश्चात्य संस्कृति को भौतिक प्रधान माना जाता है। अध्यात्म प्रधान संस्कृति से तात्पर्य अभौतिकतावादी दृष्टिकोण को अत्यधिक महत्त्व मिलने से है। प्रचीनकाल से ही वसुधैव कुटुम्बकम् और अतिथि देवो भवः के सिद्धांतों में रची-बसी भारतीय संस्कृति में विश्वास, भावना, आस्था, धर्म रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का अत्यधिक महत्त्व रहा है। धर्म प्रधान संस्कृति होने के कारण ही लोगों ने इसे अध्यात्म प्रधान संस्कृति माना है। रामकृष्ण परमहंस क शब्दों में ईश्वरत्व और त्याग पर्यायवाची शब्द हैं। संस्कृति और सदाचार उसकी बाह्य अभिव्यक्तियाँ हैं। परंपरागत दृष्टिकोण के अंतर्गत हम अपने धार्मिक अर्थात् आध्यात्मिक दर्शन को लेकर बहुत हद तक अतीत के प्रति महिमामंडित भाव रखते हैं, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर हमें इस तथ्य का मूल्यांकन करना चाहिए कि 21वीं सदी में भी क्या 5वीं सदी की मान्यताओं को जारी रखा जा सकता है? आज जब दुनिया विज्ञान की निरंतर तीव्र प्रगति के बल पर चाँद तो क्या सूर्य को भी खंगालने की कोशिश कर रही है, मानव का क्लोन बनाकर ईश्वर की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश कर रही है, तो क्या इन परिस्थितियों में धर्म या आध्यात्मिकता को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देना प्रासंगिक एवं बुद्धिमानीपूर्ण है? पाश्चात्य संस्कृति भौतिकता प्रधान और वैज्ञानिक संस्कृति है। भौतिकता प्रधान संस्कृति से तात्पर्य ऐसी संस्कृति से है, जो यथार्थवादी दृष्टिकोण को अधिक महत्त्व देती है। भौतिक का सामान्य अर्थ देखने या इंद्रियबोध से साक्षात संबंध रखने वाली वस्तु से है, अर्थात् जो यथार्थ एवं वास्तविक हो। पाश्चात्य संस्कृति को इसलिए वैज्ञानिक माना जाता है, क्योंकि इसमें जांच-पड़ताल की मूल्यांकन पद्धति अपनाकर एक सामान्य सिद्धांत या नियम बनाया जाता है, जिसके आधार पर भविष्यवाणी की जा सके और व्यक्ति एवं समाज की जीवन-शैली को बेहतर बनाया जा सके। एक ओर भारतीय समाज पर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव पड़ रहा है, तो दूसरी ओर यह हमारे लिए हितकारी भी साबित हो रही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण हममें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना कम होती जा रही है। संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन हो रहा है। पारिवारिक जीवन तनावपूर्ण एवं संघर्षपूर्ण हो गया है। पाश्चात्य संस्कृति कि नकल के कारण लोग स्वतंत्र होकर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं, परिणामस्वरूप वैवाहिक संबंधों में सुदृढ़ता एवं आत्मीयता का अभाव उत्पन्न हो गया है। संयुक्त परिवार में वैवाहिक संबंधों को टूटने से बचाने के लिए जो पारिवारिक पृष्ठभूमि होती है, वर्तमान के एकल या नाभिक परिवारों में उसका अभाव है। इस कारण विवाह विच्छेद की समस्या में वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह जैसे मामलों में वृद्धि हुई है। पाश्चात्य प्रभाव के कारण व्यक्तित्व के विकास में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, विशेषकर महिलाओं के व्यक्तित्व के विकास में। शिक्षा के प्रसार ने उन्हें अधिक महत्वाकांक्षी एवं आत्मविश्वासी बना दिया है। उनमें आत्मनिर्भरता की भावना का अत्यधिक विस्तार होने से परिवार की बेड़ियों में जकड़ी हुई घर की चहारदीवारी में कैद थीं, अब पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने लगी हैं।आजकल पाशचात्यीकरण को आधुनिकीकरण समझने की भूल की जा रही है, जो एक बड़ी समस्या है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पाश्चात्यीकरण एवं आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ सिद्धांततः भिन्न हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कुछ भिन्नताएँ होने के बाद भी उनमें काफी समानताएं हैं। सरल शब्दों में कहें, तो भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिमीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही प्रारम्भ होती है। पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण किया जाता है, जिसमें आधुनिक मूल्यों के साथ-साथ कुछ रूढ़िवादी परम्पराएँ भी शामिल रहती हैं, जबकि आधुनिकीकरण का अर्थ है-आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना एवं उसके अनुरूप व्यवहार करना। इस तरह पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत आँखें मूँदकर पाश्चात्य देशों की संस्कृति का अनुकरण नहीं किया जाता।यही कारण है कि पश्चिमीकरण के अन्तर्गत मौजूद आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना तो तार्किक एवं उपयुक्त लगता है, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के अन्य तत्त्वों का अन्धानुकरण अनुचित, किन्तु पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने की होड़ में हम अपनी भाषा, संस्कृति. वेशभूषा, रहन-सहन, कला-विज्ञान, साहित्य आदि सभी कुछ भूल गए हैं। सचमुच आज पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण करने वाले भारतवासियों को मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। यह ठीक है, पश्चिम बहुत ही कर रहा उत्कर्ष है, पर पूर्व-गुरु उसका यही पुरु वृद्ध भारतवर्ष है।इन सबके बावजूद आज हमने आधुनिकता की दौड़ में आर्थिक के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अत्यंत प्रगति की है। शिक्षा का प्रसार, संचार साधनों का विकास, भौतिकवादी संस्कृति का प्रचार आदि कारकों ने रूढ़िग्रस्त परंपरागत भारतीय आदर्शों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए हैं, जिनके फलस्वरूप रूढ़िग्रस्त, आडम्बरपूर्ण एवं अतार्किक धर्म के प्रति लोगों का लगाव कम होता जा रहा है। अधिकांश लोग अब भाग्य की अपेक्षा कर्म पर विश्वास करने लगे हैं। आधुनिकता आज समय की माँग है, लेकिन इसी के साथ-साथ भौतिकवादी दृष्टिकोण ने लोगों को यांत्रिक बना दिया है। संवेदनाएं, प्रेम, आत्मीयता एवं आमने-सामने के स्नेहपूर्ण संबंध समाप्त होते जा रहे हैं परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन नीरस एवं अर्थविहीन होता जा रहा है।इसी कारण आज आवश्यकता भारतीय संस्कृति की परंपराओं को सहेजकर रखने के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति के आधुनिक मूल्यों को आत्मसात् करने की है। पारंपरिकता आधुनिकता को आधार प्रदान करती है, उसे शुष्क नीरस एवं बुद्धि विलासी बनने से बचाती है, मानवीय व्यवहार को एक सम्यक् अर्थ प्रदान करती है।भारतीय संस्कृति की परंपराएं हमें अपने भारतीय होने का अहसास कराती हैं, जो हमें विश्व के अन्य देशों से विकास की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय संस्कृति की अनेक परंपराएं ऐसी हैं, जो सामाजिक जीवन को अधिक सरस एवं आत्मीय बनाए रखने में योगदान करती हैं, जिससे मनुष्य की तरह जीवन जिया जा सकता है, यंत्र की तरह नहीं। वहीं पाश्चात्य संस्कृति की अनेक विशेषताएं हमारे विचारों को अधिक तार्किक एवं बौद्धिक बनाती हैं, जिन्हें हम अपने व्यवहार में क्रियान्वित कर मनुष्य जीवन को अधिक सार्थक बना सकते हैं।
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