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प्रजातंत्र भाग 2 ()
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सामान्यतः प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था दो प्रकार की मानी जाती है प्रत्यक्ष प्रजातंत्र एवं अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र। शासन की वह व्यवस्था, जिसमें देश के समस्त नागरिक प्रत्यक्ष रूप से राज कार्य में भाग लेते हैं, उसे प्रत्यक्ष प्रजातंत्र कहा जाता है। इस प्रकार का प्रजातंत्र छोटे आकार के देशों में ही संभव है, जहाँ समस्त निर्वाचक एक स्थान पर एकत्र हो सकें। अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन चलाते हैं। व्यवस्था के दृष्टिकोण से प्रजातंत्र के दो रूप होते हैं संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक। संसदात्मक व्यवस्था में जनता एक निश्चित अवधि के लिए संसद सदस्यों का निर्वाचन करती है। संसद द्वारा मंत्रिमंडल का निर्माण होता है, मंत्रिमंडल संसद के प्रति एवं संसद सदस्य जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यद्यपि संसदात्मक प्रजातंत्र में राष्ट्रपति सर्वोच्च पद पर आसीन होता है, किंतु उसकी शक्तियाँ एवं अधिकार सीमित होते हैं। भारत में संसदात्मक शासन प्रणाली की व्यवस्था है। अध्यक्षात्मक प्रजातंत्र प्रणाली में राष्ट्रपति सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। अमेरिका जैसे देशों में ऐसी ही प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था है। आज संसार के अधिकतर देशों में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था है, इसलिए वर्तमान युग को प्रजातंत्र का युग कहा जाता है। प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में सरकार के तीन अंग होते हैं विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका। विधायिका का कार्य कानूनों का निर्माण करना, कार्यपालिका का कार्य उन कानूनों का सही ढंग से क्रियान्वयन करना एवं न्यायपालिका का कार्य कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करना है। इस प्रकार सरकार के तीनों अंग प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था को सशक्त बनाते हैं। प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के अनेक लाभ हैं। प्रजातांत्रिक शासन में राज्य की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाता है। राज्य व्यक्ति के विकास के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है। जिस तरह व्यक्ति और समाज को अलग करके दोनों के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती, ठीक उसी प्रकार प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रजा और सरकार के अस्तित्व को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण प्रजातंत्र के समर्थन में कार्ल मार्क्स ने कहा था कि यह समाजवाद का मार्ग है। यदि प्रजातंत्र के कई लाभ हैं, तो कई हानियाँ भी हैं। प्रजातंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि जनता शिक्षित हो। एवं अपना हित समझती हो। जनता के अशिक्षित होने की स्थिति में स्वार्थी लोग धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के आधार पर लोगों को बरगलाकर सत्ता में आ सकते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि धनी एवं भ्रष्टाचारी लोग गरीब जनता को धन का प्रलोभन देकर अपने सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव से सत्ता पाने में कामयाब हो जाते हैं। प्रौद्योगिकी में विकास के बाद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग से चुनावों में होने वाले भ्रष्टाचार में कमी तो हुई है, किंतु यदि जनता समझदार न हो, तो अभी भी भ्रष्ट उम्मीदवारों को निर्वाचित होने से नहीं रोका जा सकता।
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