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Khand 1 Exercise (11&12) ()
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अध्यक्ष महोदय, मैं आपको एक और बात बतलाना चाहती हूँ और वह यह है कि कृषि विभाग को योजना आयोग ने बहुत गलत रास्ते में बिठा दिया है। उन लोगों के पास लड़ने के लिए दम नहीं है और देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाने के लिए जो योजनाएँ चाहिए और उनके लिए जो धनराशि चाहिए, वे उनको पूरी तरह संस्वीकृत नहीं करा पाते हैं। कृषि विभाग तो जमीन की तरह आधार होता है और उसी पर देश के लिए पर्याप्त अन्न पैदा करने का महान भार है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि अधिक अन्न उपजाने के मार्ग में जो भी आवश्यक कदम यह विभाग उठाना चाहे उसमें किसी तरह की रुकावट न हो। बहुत सी हड़तालें हो सकती हैं। मजदूर काम से बरी हो सकते हैं, लेकिन किसी भी हालत में वे खाने से बरी नहीं हो सकते। अब हम देखते हैं कि मिलों और कारखानों में हड़तालें हो जाती हैं। छुट्टी हो जाती है तो आम काम के दिनों की अपेक्षा लोग उन दिनों में ज्यादा खाना खाते हैं, ज्यादा दावतें करते हैं। आज यह हमारे लिए यह सर्वाधिक महत्त्व का विषय है कि हमारा अन्न का उत्पादन उस गति से बढ़े ताकि हम अपनी खपत से अधिक उत्पादन कर उसका निर्यात कर सकें। सरकार तथा इस मंत्रालय के लिए यह समस्या एक बड़ा सिरदर्द पैदा कर रही है। हर एक विभाग में बड़े-बड़े अधिकारी बैठे हैं और हजारों रुपए के बड़े-बड़े वेतन ले रहे हैं, लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि उनका दिमाग कार्यालय की मिसिलों और कागजों में लगा रहता है। इस विभाग का काम बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। प्राकृतिक कोप के कारण जो समय-समय पर हमारी फसलों को नुकसान होता है, इससे भी अपनी फसलों की रक्षा करने के लिए आवश्यक कदम उठाना इसके जिम्मे है। आज मेरे पास लखनऊ से कुछ लोग आए थे और वे लोग बोल रहे थे कि यहाँ दिल्ली में इस अवसर पर ठंडी हवा चल रही है और आप यहाँ दरवाजे बंद करके बैठे हैं या आराम से लेटे हैं, लेकिन हमारी तो जान खतरे में है। वहाँ ओले गिर रहे हैं और हमारी गेहूँ की फसल खतरे में है। अब यह इस विभाग का काम है कि चूँकि हवा में पानी ज्यादा होता है इसलिए फसल के बचाव के लिए उस पर नियंत्रण किया जाए, जिससे फसल की हानि न हो। अध्यक्ष महोदय, जिस भावना से मैंने यह बिल पेश किया है, उसको विरोधी पक्ष के लगभग सभी सदस्यों ने एकमत से महसूस किया है कि देश में बेकारी की जो समस्या है, वह एक भयंकर समस्या है और उसके कारण हमारे देश का विकास चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो या सांस्कृतिक रुका हुआ है और ऐसी स्थिति में हम आगे बढ़ नहीं सकते हैं। इसी प्रकार से इस परिस्थिति का निर्माण हम पिछले 54 वर्षों से देख रहे हैं। मंत्री महोदय ने यहाँ पर अभी कहा कि राष्ट्रपति इस काम को नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह उनके अधिकार के बाहर है। आप राज्यों में राज्यपाल शासन स्थापित करते हैं, जब यह देखते हैं कि किसी राज्य में वहाँ की व्यवस्था, वहाँ का विकास ठीक नहीं हो रहा है। जब किसी राज्य में गड़बड़ी फैल रही हो, विकास का काम समाप्त हो गया हो और जिम्मेदारी से लोग काम न करते हों तो वहाँ पर राज्यपाल शासन स्थापित किया जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हमारे देश में मौजूद हैं। उसी प्रकार के हमारे राष्ट्रपति हैं और अगर देश में इस तरह की स्थिति वर्षों तक चले तो कोई कारण नहीं है आपात के रूप में राष्ट्रपति इस देश की सुरक्षा के लिए, इस देश की उन्नति के लिए जिम्मेदारी अपने हाथ में न ले सकें। हमारे भाइयों ने बहुत से उदाहरण दिये हैं कि राज्यों में संयुक्त सरकारें नहीं चलीं, लेकिन उसके पीछे राजनीतिक हथकंडे थे। अगर कोई राजनीतिक पार्टी जिम्मेदारी से काम नहीं करती तो विधान में यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति शासन अपने हाथ में लें। मैं एक उदाहरण देता हूँ कि संविधान में आदिवासी हरिजनों के उत्थान के लिए प्रण किया गया था कि दस वर्ष में उनकी सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति को सुधार देंगे, लेकिन यह सरकार उसमें भी असफल रही। उसको एक बार दस वर्ष के लिए बढ़ाया गया और दुबारा फिर दस वर्ष के लिए बढ़ाया गया। इसी तरह से उसको बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन उनकी आर्थिक और सामाजिक उन्नति आप नहीं कर पाए हैं। इस काम में सरकार बिलकुल असफल हुई है। पिछली बार सरकार पर अविश्वास का प्रस्ताव भी आया था और वह पास होने वाला था। इसलिए मेरा कहना है कि हमारे देश में यह जो बेकारी की समस्या है, वह एक बहुत भयंकर समस्या है। पंजाब के संबंध में मुझे यह कहना है कि अभी कुछ दिन पूर्व वहाँ पर भाषा का प्रश्न उत्पन्न हुआ। मेरा अपना विचार है कि जब भाषा के आधार पर पंजाब का विभाजन हो गया तो आज पंजाब की भाषा पंजाबी है और यह पंजाब के लोगों को निर्णय करना है कि वह पंजाबी किस लिपि के अंदर लिखी जाए, लेकिन एक बात मैं पंजाब की सरकार से आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूँ कि आज जब पंजाब के अंदर 45 प्रतिशत लोग इस प्रकार के हैं जो कहते हैं कि हमारी अपनी मातृभाषा हिंदी है तो पंजाब की सरकार को अल्पसंख्यकों की भाषा को संरक्षण देने के नाम पर दूसरी भाषा के रूप में हिंदी को मानने में किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे दोनों के संबंधों में मधुरता आएगी और किसी प्रकार के अनावश्यक आंदोलन से हमारा सीमावर्ती राज्य बचा रहेगा।
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