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Khand 1 Exercise (13&14) ()
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महोदय, यह भी विचार किया गया है कि जो व्यक्ति समाज में काम करता है चाहे आविष्कार का काम करे चाहे दूसरा कोई काम करे उसको उस काम में तब तक सफलता नहीं मिल सकती है जब तक कि समाज का सहयोग या समाज ने जो परिश्रम किया है या कुछ आविष्कार किया है उसका उपयोग उसको प्राप्त न हो, उसका उपयोग वह न कर सके। इसलिए जब भी कोई व्यक्ति किसी वस्तु का आविष्कार करता है तो आविष्कार करने में न केवल उसका अपना परिश्रम रहता है, लेकिन साथ ही साथ समाज ने जो काम किया होता है चाहे विज्ञान के क्षेत्र में या प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में या किसी अन्य क्षेत्र में उस सबसे भी वह लाभान्वित होता है। इसलिए जब हम किसी आविष्कारक के किसी आविष्कार के अधिकार की रक्षा करना चाहते हैं तो उसके साथ-साथ यह भी विचार हमारे दिमाग में आता है जिस व्यक्ति ने समाज की सहायता से आविष्कार किया है, उस समाज को भी उसका फल अधिक से अधिक मिलना चाहिए। माननीय मंत्री जी ने भी कहा है कि पेटेन्ट ला इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। मैं समझता हूँ कि पेटेन्ट ला के पीछे दो सिद्धांत निश्चित हैं। पहला सिद्धांत तो यह है कि जो व्यक्ति परिश्रम करके, धन लगाकर, अपना दिमाग लगाकर किसी वस्तु का आविष्कार करता है, उसके तथा अपने परिवार के लोगों के अधिकारों की जहाँ रक्षा होनी चाहिए उसके साथ ही साथ जैसा मैंने अभी कहा है कोई व्यक्ति समाज में व्यर्थ में काम नहीं करता है वरन् पिछले समाज के लोगों ने जो-जो काम किए होते हैं चाहे विज्ञान के क्षेत्र में या प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में या किसी अन्य क्षेत्र में और जिनके आधार पर वह कोई आविष्कार करता है उसको उसका प्रतिफल तो मिले, लेकिन जो परिणाम हो, उसका प्रतिफल समाज को भी मिलना चाहिए। मंत्री महोदय ने कहा है कि जो यह सिद्धांत है वह भी इस विधेयक के पीछे स्थापित किया गया है और इस बात का ध्यान रखा गया है कि जहाँ हम किसी व्यक्ति के आविष्कार के जो अधिकार हैं चाहे धन के उपार्जन का अधिकार हो, या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अधिकार हो, उसे प्रतिष्ठा का और चाहे धन का, दोनों का लाभ व्यक्ति विशेष को भी मिले। महोदय, देश में जो उद्योग धंधा चल रहा है या देश की उन्नति करने का देश में समृद्धि लाने का जो वैज्ञानिक या प्रौद्योगिकीय आविष्कार हो रहा है उसमें भी उसका उपयोग पूरा-पूरा हो। यदि ऐसा हो तभी मैं समझता हूँ कि हमारी पेटेन्ट प्रणाली सफल सिद्ध हो सकती है। यह प्रश्न उठ सकता है कि किस सीमा तक व्यक्ति के अधिकार की रक्षा की जाए और किस सीमा तक उसके अधिकार का हनन किया जाए ताकि समाज का अधिक से अधिक लाभ हो, समाज उसका अधिक से अधिक उपयोग कर सके। एक दृष्टिकोण जो इसके पीछे है। हमें इस बात का अभिमान है कि हम एक सौ एक करोड़ हैं। हमारी कई जातियाँ, कई धर्म कई भाषाएँ और कई प्रकार के रीति-रिवाज हैं। इस विविधता से हमें लाभ उठाना चाहिए, किंतु आज भेदभाव का भूत हमारे सिर पर चढ़ रहा है। भारत को स्वतंत्रता मिली है, इसका अर्थ यह होना चाहिए कि गरीबों की सेवा के लिए आज तक हमें जो सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं, वे मिली हैं। जिस प्रकार भरत ने अयोध्या के राज्य को राम का समझकर सेवक-वृत्ति से राज्य का काम संभाला था, उसी प्रकार हमें समझना चाहिए कि राज्य गरीब जनता का है और उसके नाम पर उसके संरक्षक बनकर हमें उसको चलाना है। अब गरीब को ऐसा अनुभव होना चाहिए कि हर एक उसकी सेवा में लग रहा है। सूर्य के उदय होने पर धनी, गरीब सबके घरों में प्रकाश पहुँचता है। ठीक उसी प्रकार स्वराज्य का लाभ सबको एक समान मिलना चाहिए। इसका सुख धनी-निर्धन सबको बराबर मिलना चाहिए। जनता को हमने वचन दिया था कि स्वराज्य मिलने पर हम आपके दुख दूर करेंगे, अब वह समय आ गया है जब कि हमें अपने उस दिए हुए वचन को सार्थक करना है। इतने बड़े देश में विचार भेद होना स्वाभाविक है। देखना यह है कि हम लोगों के विचारों में कुछ समान अंश भी हैं या नहीं। यदि हैं तो समान कार्यक्रम बनाइए। इस प्रकार कार्य करने से हमारे भेदभाव कम होते-होते एक दिन मिट जाएँगे और अच्छी बातों का अपने आप उदय होने लगेगा। अगर उसी प्रकार भेद स्थापित करने का प्रयत्न किया गया तो लोग सत्ता के पीछे पड़ जाएँगे और स्वराज्य प्राप्त होने का आनन्द हम लोगों को नहीं मिल सकेगा। इससे दोनों के संबंधों में मधुरता आएगी और किसी प्रकार के अनावश्यक आंदोलन से हमारा सीमावर्ती राज्य बचा रहेगा। जहाँ तक लिपि का संबंध है, लिपि के संबंध में मैं बलपूर्वक किसी लिपि को समाप्त करने के पक्ष में नहीं हूँ। मेरा विचार रहा है कि देश में अपनी लिपियों को सुरक्षित रखते हुए अगर प्रादेशिक भाषाएँ किसी एक सामान्य लिपि को वैकल्पिक लिपि के रूप में स्वीकार कर लें तो देश की अनेक भाषाओं को निकट आने में बहुत बड़ी सहायता मिल सकेगी। अगर पंजाब के लोग भी इसी आधार पर विचार कर सकें तो मैं समझता हूँ कि यह पंजाबी भाषा के हित में और देश की एकता के हित में होगा। अंतिम बात जिसको कहकर मैं अपना भाषण समाप्त करना चाहता हूँ वह है प्रश्न जो पंजाब और हरियाणा में तनाव का कारण बना हुआ है और वह है चंडीगढ़ का प्रश्न। सभापति जी, आपने देखा होगा कि कल इस प्रश्न को लेकर यहाँ एक गर्मागर्मी का वातावरण भी उत्पन्न हुआ।
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