Call us: +91 7393976701
Please Wait a Moment
Menu
Dashboard
Register Now
Join Us
Khand 1 Exercise 15&16 ()
Font Size
+
-
Reset
Backspace:
0
Timer :
00:00
अध्यक्ष जी, किसी भी देश की विदेश नीति अपने में कोई स्वतंत्र नीति नहीं होती है वरन् वह किसी देश की आंतरिक नीति को स्पष्ट करती है। उदाहरण के लिए हम अमरीका को ले सकते हैं। उसने अपने यहाँ अधिक अन्न पैदा किया और जब उसके पास अनाज फालतू बच गया तब वह अपने बकाया अनाज की बिक्री के लिए ऐसे देशों की तलाश करने लगा, जो उधार पर माल ले सकते हों, किंतु हमारी आंतरिक नीति ने यह तय किया कि खर्चीले ढँग से सरकार चलाएँगे और स्वदेशी मुद्रा की कोई राशि हमारे पास नहीं बचेगी। हमने कर भी लगा दिए और मुद्रा प्रसार भी कर दिया। कुछ संकट पड़ने के बाद इस बात की आवश्यकता को नहीं समझा कि उस पैसे का कहीं अन्यत्र उपयोग कर सकें। श्रीमन, मुझे माननीय प्रधानमंत्री जी के इस कथन पर दुख होता है कि दुनिया के अमीर और गरीब देशों का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। मैं उनसे यह पूछना चाहती हूँ कि भारत की विदेश नीति ने उस अंतर को घटाने की क्या कोशिश की है? क्या भारत सरकार ने कभी दुनिया की पंचायत में यह कहने की हिम्मत की है कि बालिग मताधिकार के आधार पर यूएनओ का चुनाव होकर एक संसद बनाई जाए? और क्या आपमें यह देखने की हिम्मत है कि फौज के हिसाब से कर लगाकर एक विकास का खाता खोल दिया जाए? जो देश विकसित हैं उनके मजदूरों का एक घंटा हमारे देश के मजदूरों के सौ घंटों के बराबर माना जाता है, क्योंकि उनके पास साधन हैं। इसीलिए यह अंतर और भी बढ़ता चला जा रहा है। किसी देश के अंदर आंतरिक नीति में अमीरी और गरीबी का अंतर बढ़ता चला जा रहा हो और वह दुनिया के देशों में विद्यमान अमीरी और गरीबी के इस अभिशाप को समाप्त करेगा, यह समझ में आने वाली बात नहीं है। अब मैं आपका ध्यान एक और बात की ओर दिलाना चाहती हूँ। पूर्वी जर्मनी को मान्यता देते हमें परेशानी होती है, इसलिए कि शायद पश्चिमी जर्मनी को बुरा लगे, लेकिन पश्चिमी जर्मनी ने तो अपनी रक्षा का भार दूसरों पर छोड़ दिया है। उसने अपनी पूरी शक्ति इस बात पर लगा दी है कि अधिक से अधिक उत्पादन किया जाए। आपने जो समय दिया उसके लिए मैं आभार प्रदर्शन करता हूँ और आपका धन्यवाद करता हूँ। अध्यक्ष जी, जिस समय पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था उस समय उन्होंने देश की रक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। इसके साथ ही मैं मंत्री महोदय को यह भी स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि शायद उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया कि इस बार जो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं उनमें रेलवे प्रशासन को केवल दो ही प्राप्त हुए हैं जबकि मैं ऐसा मानता हूँ कि हमारी सेना के बाद अगर किसी ने युद्धकाल में सराहनीय कार्य किया है तो वह रेलवे प्रशासन अथवा रेलवे कर्मचारी और अधिकारी हैं। इसलिए उनके मनोबल को बनाए रखने के लिए और उनको प्रोत्साहित करने के लिए रेल मंत्री को इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए और इसका प्रयास करना चाहिए कि जो भी इस तरह के प्रोत्साहन मिलें उनमें रेलवे का विशेष ध्यान रखा जाए। रेल मंत्री महोदय ने अपने वक्तव्य में भी रेलवे कर्मचारियों की प्रशंसा की है या उनको प्रोत्साहन दिलाया है, लेकिन यह प्रोत्साहन शांति काल में भी बना रहना चाहिए। रेलवे ने युद्धकाल में जो काम किया वह तो देश की रक्षा का महान उद्देश्य था, लेकिन उसके बाद देश के निर्माण में या गरीबी मिटाने के लिए जो युद्ध होता है उसमें भी प्रत्येक रेलवे कर्मचारी का मनोबल उसी तरीके से बना रहे, इसके लिए भी रेल मंत्री महोदय को कुछ कदम उठाने की आवश्यकता है। मैं ऐसा मानता हूँ कि वह किसी भी तरीके से करें उनका तरीका कुछ भी हो, लेकिन उनको यह करना चाहिए कि जितने भी रेलवे कर्मचारी हैं जो भी रेलवे को मुनाफा हो उसमें वह साझीदार हों। चाहे आप उनको बोनस के रूप में कुछ दें चाहे किसी और तरीके से दें, लेकिन हर वर्ग के रेलवे कर्मचारी को मालूम होना चाहिए कि यदि वह देश के निर्माण के संबंध में ठीक तरह से काम करेगा तो उसको पुरस्कार के रूप में या वेतन के अंश के रूप में अपने वेतन के अलावा पैसा मिलेगा। इसी प्रकार इस संबंध में मैं एक और सुझाव देना चाहता हूँ। स्वतंत्रता के बाद रेल प्रशासन भारत सरकार का प्रशासन हो गया, लेकिन यह लोकसभा एक विशेष उद्देश्य को लेकर चुनी गई है। यह उस कार्यक्रम का एक नमूना ही है। गांधी जी ने जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला था। धन को वे संयम से व्यय करने के हक में थे। जिस तत्परता से सरकार ने बैंकों को अपने हाथ में लिया है, उससे आर्थिक क्षेत्र में कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं। नए-नए लोगों में नई-नई आशाएँ जागी हैं। अगर ये आशाएँ पूरी नहीं की गईं तो उनके परिणाम भयंकर होंगे। सहकारिता के क्षेत्र में हमने लोगों में नई आशाएँ जगाई हैं, समाजवाद मात्र इरादा नहीं है, इरादे अच्छे हो सकते हैं, नेक हो सकते हैं, लेकिन जिस मशीनरी के द्वारा, जिस तंत्र के द्वारा वह इरादे व्यवहार में लाने हैं, अगर वह मशीनरी भ्रष्ट है, अगर वह तंत्र अक्षम है, अगर जनता के प्रति उनके हृदय में सहानुभूति नहीं है, तो फिर राष्ट्रीयकरण भी सहकारिता की तरह से एक बदनाम चीज हो जाएगी। सरकार बहुत से कारखाने चला रही है। कुछ अच्छे चल रहे हैं, कुछ बुरे चल रहे हैं, लेकिन कारखाने चलाने के लिए, सरकारी संस्थाएँ चलाने के लिए जैसे आदमी हमें चाहिए वैसे आदमी तैयार करने का हमने प्रयत्न नहीं किया है।
Submit
Submit Test !
×
Dow you want to submit your test now ?
Submit