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भारत का विभाजन अपने सबसे बुनियादी रूप में अभूतपूर्व मानव विस्थापन और मजबूरी में पलायन की कहानी है। आश्चर्य नहीं है कि अधिकांश लोगों, यहाँ तक कि भारत के विभाजन से बेहद कम जुड़ाव वाले लोगों की भी स्मृतियाँ और आम धारणाएँ सामान्यतः मृत्यु और बर्बादी से जुड़ी हैं। भारत विभाजन की भयावहता ने विशेषकर पंजाब में आमजनों, छोटे किसानों, छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और पुश्तैनी व्यवसाय में लगे लोगों को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। समाज के बहुत बड़े भाग को कुछ पता नहीं था कि क्या हो रहा था और क्यों हो रहा था। अनभिज्ञ, भाग्यवादी और अंधविश्वास से ग्रस्त उन्हें अपने घरों में शीघ्र ही अवांछित व्यक्ति बना दिया गया था। बड़े पैमाने पर इस आबादी को इधर से उधर किया गया और उसे यह भी नहीं पता कि हासिल क्या होना है। सकल घरेलू उत्पाद कभी भी हमारे अंतर्मन को नहीं पढ़ सकता है और जीवन के प्रति संतुष्टि और खुशहाली की भावना सिर्फ पैसे और उच्च आय से नहीं आती है। अमेरिका के आँकड़े गवाह हैं कि वहाँ पिछले कुछ वर्षों में उच्च आय दर्ज की गई है, परंतु खुशियों का ग्राफ नीचे गिरा है और जीवन के प्रति संतुष्टि की भावना घटी है। खुशी एक भावना भी होती है और यह जीवन की एक मनःस्थिति भी है जो जीवन के मात्रात्मक आधारों से कम और गुणात्मक आधारों से अधिक तय होती है। हो सकता है कि एक निर्धन व्यक्ति जो समग्र रूप में अपने जीवन से असंतुष्ट हो, किसी परिस्थिति विशेष में खुशहाल और संतुष्ट हो। किसी भी देश के नागरिकों की खुशियाँ, सम्पन्नता के साथ ही साथ उनकी स्वतंत्रता में भी निहित हैं, जिसके लिए एक ईमानदार शासन प्रणाली का होना भी बहुत जरूरी है, जिससे उन्हें एक अच्छा अभिशासन प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के संदर्भ में विकास का मुद्दा भी अहम है। कार्बन कटौती का प्रत्यक्ष संबंध औद्योगिकरण पर नियंत्रण से है। इस पर विकासशील देशों का तर्क है कि यदि हमने औद्योगिकरण की गति पर रोक लगाई, तो हमारा विकास एवं राष्ट्रीय आय प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे। विकासशील देशों का यह भी आरोप है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन संबंधी इन बाध्यकारी समझौतों के माध्यम से हमारे विकास की रणनीति को बाधित करने का षड्यंत्र रच रहे हैं। वहीं विकासशील देश हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को मुख्य कारक मानते हुए विकसित देशों पर इसे बढ़ाने का आरोप लगाते रहे हैं। संक्षेप में कहें तो विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य समझौते के स्वरूप पर एकमतता न बन पाना दशकों से जलवायु परिवर्तन समझौता न हो पाने की मुख्य वजह बना हुआ है।
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