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हैरानी की बात यह है कि बाल तस्करी के फैलते जाल पर शीर्ष अदालत के सख्त रुख के बावजूद कई राज्यों ने अब तक न जरूरी रपट तैयार की है और न ही समितियाँ बनाई हैं। समस्या की गंभीरता को देखते हुए स्वाभाविक ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के लापरवाह रवैये पर नाराजगी जताई। इनमें तस्करी के मामलों में छह महीने के भीतर हर रोज सुनवाई करना, मानव तस्करी रोधी इकाइयों को मजबूत करना और जाँच प्रक्रिया में सुधार करना शामिल था। अदालत ने राज्यों को यह निर्देश दिया था कि वे तस्करी के संभावित संवेदनशील स्थानों की पहचान और निगरानी के लिए राज्यस्तरीय समितियाँ बनाएँ और लापता बच्चों के मामलों को तस्करी मानकर जाँच शुरू करें। इन सभी उपायों का उद्देश्य सरकार के राजकोषीय रोडमैप से समझौता किए बिना मध्यम वर्ग को सशक्त बनाना है। साथ ही पुरानी आयकर व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है और न ही इसके समाप्त होने की कोई तारीख बताई गई है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई मध्यमवर्गीय व्यक्ति कर मुक्त बचत और निवेश योजना अपनाना चाहता है, तो उसके पास पुरानी कर व्यवस्था का विकल्प रहेगा। यदि कोई मध्यमवर्गीय व्यक्ति कम कर देना चाहता है, तो उसके लिए भी प्रावधान मौजूद है। यद्यपि नई कर व्यवस्था में राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में कर्मचारी अंशदान कर कटौती के लिए पात्र नहीं है, लेकिन आयकर अधिनियम की धारा 80 के तहत मूल वेतन के 14 प्रतिशत तक नियोक्ता अंशदान पूरी तरह से कर मुक्त है। इससे व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति निधि बनाते समय अधिक कर मुक्त आय का लाभ उठाने की सुविधा मिलती है। अक्सर कहा जाता है कि बजट भाषण में कही गई बातों से कहीं अधिक बातें बजट के सूक्ष्म प्रावधानों में छिपी होती हैं। इस वर्ष भी यही स्थिति रही है। इसलिए मध्यम वर्ग को निराश होने की आवश्यकता नहीं है। बजट में कई ऐसी बारीक जानकारियाँ हैं, जिन्हें पढ़कर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी। हजारों विशेषताओं से परिपूर्ण भारत को इस समय कुछ आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है। धार्मिक कट्टरता, जाति प्रथा, अंधविश्वास, नारी शोषण, दहेज प्रथा, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि, भ्रष्टाचार, गरीबी इत्यादि हमारी प्रमुख सामाजिक समस्याएँ हैं तथा जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार, गरीबी, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, औद्योगीकरण की मंद प्रक्रिया इत्यादि भारत में आर्थिक विकास की कुछ मुख्य चुनौतियाँ हैं। देश एवं समाज की वास्तविक प्रगति के लिए इन आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का शीघ्र समाधान आवश्यक है। लगभग एक हजार वर्षों की परतंत्रता के बाद अनेक संघर्षों व बलिदानों के फलस्वरूप हमें स्वाधीनता प्राप्त हुई थी। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद हमारी एकता सुदृढ़ तो हुई, परंतु सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता, अज्ञानता और भाषागत अनेकता ने पूरे देश को आक्रांत कर रखा है।
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