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हम अपने प्रति लोगों के व्यवहार की जैसी अपेक्षा करते हैं, वैसा अपना व्यवहार दूसरों के प्रति रखना चाहिए। नागरिक चेतना में सुधार सामाजिक जीवन-स्तर को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है। इसके तहत स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में सिविक सेंस का बोध करवाने वाली कुछ प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करना चाहिए, ताकि इस महत्त्वपूर्ण बिंदु पर विचार-विमर्श किया जा सके। हम सबको नागरिक चेतना के साथ अपने नित्य जीवन में खरा उतरने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि स्वच्छ, स्वस्थ, सभ्य समाज और उन्नत समाज की ओर बढ़ने में जनभागीदारी और सहयोग की अपेक्षा हमेशा सर्वोपरि रहती है। धारणीय विकास की अवधारणा आर्थिक विकास की नीतियों को पर्यावरण के अनुरूप बनाने पर जोर देती है। इसका उद्देश्य पर्यावरण के विरुद्ध चलने वाली विकास नीतियों में बदलाव लाना है। धारणीय विकास न केवल पर्यावरण के साथ सामंजस्य लाता है, बल्कि यह परिवर्तन की प्रक्रिया को इंगित करता है, जिसमें संसाधनों का दोहन, निवेश की दिशा, तकनीकी विकास की स्थिति तथा संस्थागत परिवर्तनों को वर्तमान के साथ भविष्य की आवश्यकताओं के भी अनुकूल बनाया जा सके। यह आर्थिक विकास की दौड़ के प्रति विश्व को सचेत करता है, ताकि विकास तो हो पर प्राकृतिक संसाधनों को कोई क्षति न पहुँचे। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता दिखाई पड़ रही है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा तथा पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन लगभग सभी विकसित एवं विकासशील देशों में देखा जा रहा है। आज अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपनी कार्यसूची में पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। यह उन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों से प्रमाणित होता है, जिसमें विश्व के लगभग सभी देशों का शीर्ष नेतृत्व शामिल होकर पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के संदर्भ में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं, किंतु आज भी विकसित देशों की हठधर्मिता पर्यावरणीय मुद्दों के समाधान में रोड़ा बन रही हैं। हम यह भूल जाते हैं कि विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण व्यापक शैक्षिक सुधारों के अनुरूप है जो अनुभव पर आधारित शिक्षा, बहुविषयक एकीकरण और डिजिटल साक्षरता पर बल देते हैं। विद्यालयों में एवीजीसी प्रयोगशालाएँ संज्ञानात्मक विकास, सहयोगात्मक समस्या समाधान और कंप्यूटर की तरह सोचकर समस्या हल करने की प्रक्रिया को सुदृढ़ कर सकती हैं। रचनात्मक उपकरणों के संपर्क में आने से आत्मविश्वास और आत्म-अभिव्यक्ति को भी बढ़ावा मिलता है, विशेष रूप से उन छात्रों में जो पारंपरिक शैक्षणिक ढाँचों में उत्कृष्ट प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं, लेकिन असाधारण कलात्मक या कथात्मक क्षमताएँ प्रदर्शित करते हैं। इसी तरह हम अवसरों का लोकतंत्रीकरण करते हैं। प्रतिभा पूरे भारत में समान रूप से वितरित है, लेकिन उस तक पहुँच समान नहीं है। विद्यालयों में एवीजीसी प्रयोगशालाएँ इस अंतर को पाटने में सहायक हैं।
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