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भारतीय साहित्य की बहुभाषी व्यवस्था हमें देश और सीमांत के बहुआयामी इतिहास को समायोजित करने के लिए विवश करती है। औपनिवेशिक उद्यम और राष्ट्रवाद के जटिल प्रक्षेप पथ ने समकालीन आधुनिक भारतीय साहित्य का मार्ग प्रशस्त किया है, जहाँ इतिहास के उपाख्यानों को साहित्यिक अभिव्यक्तियों में जोड़ा जाता है। स्वतंत्र भारत के उदय ने भारतीय लेखकों और कथाओं को कई तरह से प्रेरित किया है। पिछली दो शताब्दियों में भारतीय राष्ट्र की स्थिति के राजनीतिक लेखन के पीछे काम करने वाले धार्मिक और सामाजिक विभाजन ने आधुनिक भारतीय साहित्य को आकार दिया था। भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन का पीढ़ियों पर विनाशकारी और व्यापक प्रभाव पड़ा है। इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे शांति, प्रेम और प्रसन्नता नहीं चाहिए। यही हमारी आत्मा का सौंदर्य है। जितनी अधिक कृतज्ञता, उतनी अधिक कृपा। जितनी कृपा, उतनी प्रसन्नता, उतना अधिक ज्ञान। हमें अपने आप को विशालता में स्थिर करना चाहिए। आध्यात्मिकता के पथ पर बढ़ते हुए अपने अंतर की समीक्षा करनी चाहिए। अपने उद्देश्य का नवीनीकरण करना चाहिए। गुरुचेतना के प्रकाश में हमेशा स्वयं को परखते रहना चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि हमारे अंदर कहीं कोई लालसा, वासना तो पनप नहीं रही है। कहीं कोई चाहत तो नहीं उमड़ रही। यदि ऐसा है तो हमें अपनी मनःस्थिति को कठिन तप करके बदल डालना चाहिए। इसी का एक पक्ष यह भी है कि आर्थिक समृद्धि से वंचित देश केवल अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के ही प्रयत्न करते रह जाते हैं और नवाचार तथा वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने की दिशा में वहाँ बहुत उन्नति नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में वहाँ के वैज्ञानिक या उद्यमी मनोवृत्ति वाले नागरिक देश छोड़कर चले जाने व किसी विकसित देश में अपने विचारों को मूर्त रूप देने का निर्णय लेते हैं। अतः वहाँ आर्थिक समृद्धि व सामाजिक न्याय दोनों की स्थिति निम्न ही बनी रहती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सामाजिक न्याय के सपने को साकार कर पाना अर्थव्यवस्था के निरंतर समृद्धि की ओर बढ़ते रहने पर ही संभव है। वस्तुतः पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, जिससे निपटना वैश्विक स्तर पर ही सम्भव है, किंतु इसके लिए प्रयास स्थानीय स्तर पर भी किए जाने चाहिए। विकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। संतुलित एवं शुद्ध पर्यावरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा। हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किया जाना भी आवश्यक है, किंतु ऐसा करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि इससे पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान न हो।
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