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महिला सशक्तिकरण 2 ()
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वहां व्यक्ति से तात्पर्य सिर्फ पुरुष से था। इंग्लैंड में व्यक्ति को वोट देने का अधिकार था, लेकिन स्त्रियां वर्ष 1918 तक इससे वंचित थीं। अमेरिका में भी वे वर्ष 1920 तक वंचित रहीं। विश्व में पहली बार भारत में व्यक्ति के अंतर्गत महिला को शामिल किया गया, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोर्नेलिया सोराब जी नामक महिला के वकालत करने संबंधी आवेदन को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यक्ति की श्रेणी में महिलाओं को लगभग वर्ष 1929 के आस-पास ही स्वीकार किया गया। जहां (1) समाज की आधी आबादी को व्यक्ति का दर्जा ही प्राप्त नहीं हो, वहां उसके साथ व्यक्ति जैसा व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। फलस्वरूप स्त्रियों को केवल एक अवैतनिक श्रमिक एवं उपभोग की वस्तु के रूप में देखा गया। मनुष्यता की अपेक्षा एक मनुष्य के प्रति हो सकती है। एक वस्तु के प्रति नहीं, इसलिए कभी समाज ने उसे नगर वधू बनाया, तो कभी देवदासी, कभी चहारदीवारी में कैद रहने वाली कुलीन मर्यादापूर्ण घर की बहू बनाया, तो कभी बाजार में बिकने वाली वेश्या। पुरुष मानसिकता ने कभी (2) भी उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा। इसके पीछे की मानसिकता की अब कितनी भी सामाजिक-सांस्कृतिक व्याख्या प्रस्तुत की जाए, लेकिन सदियों से दासता की जंजीरों में जकड़े स्त्री समुदाय को अपनी दासता की मानसिकता से बाहर निकलने में अभी भी समय लगेगा। जैसे-जैसे उसका अनुभव प्रत्यक्ष एवं व्यापक होता जाएगा, वैसे-वैसे स्त्रियां अपने अधिकारों एवं स्वतंत्रता-समानता के प्रति सचेत होती जाएंगी। फ्रांस से प्रारंभ नारी मुक्ति आंदोलन ने स्त्रियों को जीवन की एक नई परिभाषा प्रदान की, उन्हें पुरुषों का सहचर बनने की प्रेरणा दी, अपनी (3) अपनी स्वतंत्रता एवं अधिकारों के साथ खुलकर गरिमापूर्ण जीवन जीने की सीख दी। घर से बाहर निकलने एवं कामकाज करने वाली स्त्री घरेलू स्त्रियों से अलग अपनी एक भाषा चाहती है, एक संस्कृति चाहती है, एक परिवेश चाहती है और इसे हासिल करने के लिए संघर्ष भी करना चाहती है, इसलिए पुरुषों की दुनिया में खलबली है। कई बार पुरुषों ने स्त्रियों की ज्यादती की भी शिकायतें कीं। यह संभव है कि कुछ अति उत्साही स्त्रियां अपनी स्वतंत्रता का अनुचित इस्तेमाल करती हों, उन्हें यह पता नहीं कि स्वतंत्रता हमेशा प्रतिमानों (4) में निहित होती है, लेकिन ऐसी स्त्रियां कितनी हैं? एक प्रतिशत भी नहीं, जबकि दूसरी तरफ प्रताड़ना देने वाले पुरुष कितने हैं, संभवतः पचास प्रतिशत से भी अधिक। स्त्रियों के संदर्भ में प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन ने एक जगह लिखा है वास्तव में स्त्रियां जन्म से अबला नहीं होती हैं, उन्हें अबला बनाया जाता है। पेशे से डॉक्टर तस्लीमा नसरीन ने उदाहरण के साथ इस तथ्य की व्याख्या की है, जन्म के समय एक स्त्री शिशु की जीवनी-शक्ति एक पुरुष शिशु की अपेक्षा अधिक प्रबल होती है, लेकिन समाज अपनी संस्कृति एवं जीवन-शैली के द्वारा उसे अबला बनाता है।
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