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आरक्षण ()
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स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में दलितों एवं आदिवासियों की दशा अति दयनीय थी। इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने काफी सोच-समझकर इनके लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की और वर्ष 1950 में संविधान के लागू होने के साथ ही सुविधाओं से वंचित वर्गों को आरक्षण की सुविधा मिलने लगी, ताकि देश के संसाधनों, अवसरों एवं शासन प्रणाली में समाज के प्रत्येक समूह की उपस्थिति सुनिश्चित हो सके। उस समय हमारा समाज ऊंच-नीच, जाति-पांति, छुआछूत जैसी कुरीतियों से ग्रसित था। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने एक बार कहा भी था, यदि कोई एक व्यक्ति भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए, तो भारत को अपना सर शर्म से झुकाना पड़ेगा। वास्तव में आरक्षण वह माध्यम है, जिसके द्वारा जाति, धर्म, लिंग एवं क्षेत्र के आधार पर समाज में भेदभाव से प्रभावित लोगों को आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त होता है, किंतु वर्तमान समय में देश में प्रभावी आरक्षण नीति को उचित नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि आज यह राजनेताओं के लिए सिर्फ वोट नीति बनकर रह गई है। वंचित वर्ग का निचला तबका आरक्षण के लाभ से आज भी अछूता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा में आरक्षण लागू है। मंडल आयोग की संस्तुतियों के लागू होने के बाद वर्ष 1993 से ही अन्य पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई। वर्ष 2006 के बाद से केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानों में भी अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू हो गया। इस प्रकार आज समाज के अत्यधिक बड़े तबके को आरक्षण की सुविधाओं का लाभ प्राप्त हो रहा है, लेकिन इस आरक्षण नीति का परिणाम क्या निकला? अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण लागू होने के लगभग छः दशक बीत चुके हैं और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के भी लगभग दो दशक पूरे हो चुके हैं, लेकिन क्या संबंधित पक्षों को उसका पर्याप्त लाभ मिला? सत्ता एवं सरकार अपने निहित स्वार्थों के कारण आरक्षण की नीति की समीक्षा नहीं करती। अन्य पिछड़े वर्गो के लिए मौजूदा आरक्षण की समीक्षा तो संभव भी नहीं है, क्योंकि इससे संबद्ध वास्तविक आंकड़ों का पता ही नहीं है, चूंकि आंकड़े नहीं हैं, इसलिए योजनाओं का कोई लक्ष्य भी नहीं है। आंकड़ों के अभाव में इस देश के संसाधनों, अवसरों और राजकाज में किस जाति और जाति समूह की कितनी हिस्सेदारी है, इसका तुलनात्मक अध्ययन ही संभव नहीं है। नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े इसमें कुछ मदद कर सकते हैं, लेकिन इतने बड़े देश में चार-पांच हजार के नमूना सर्वेक्षण से ठोस नतीजे निकाले जा सकते हैं। जब आप पर खोने के लिए कुछ न होगा, तब आप अद्भुत आविष्कार करेंगे, आप बिना डर या आरक्षण के बड़ा जोखिम लेने हेतु तैयार रहेंगे।
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