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भारत माध्यमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने की दिशा में अच्छी तरह से अग्रसर है। इस आयु वर्ग के अधिकांश लोग पहले से ही स्कूल में नामांकित हैं। यह संख्या बढ़ेगी। आकांक्षाएँ व्हाइट-कॉलर नौकरियों और सरकारी रोजगार की ओर निर्देशित हैं। यही वह समय है, जब उपयुक्त और प्रासंगिक ज्ञान, खुला और लचीला दृष्टिकोण तथा व्यावहारिक और अनुप्रयुक्त कौशल विकसित किए जाने चाहिए। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास जैसी पर्यावरणीय चुनौतियाँ अब दूर की समस्या नहीं रहीं, ये सीधे हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही हैं। अत्यधिक मौसम परिवर्तन, जल की कमी, मिट्टी का कटाव और घटती वायु गुणवत्ता आदि प्रभावी कारक हैं। ऐसे परिवेश में बढ़ रहे बच्चों और युवाओं के लिए जागरूकता ही सार्थक कार्रवाई की पहली सीढ़ी है। जब वे मानव गतिविधियों और पर्यावरणीय प्रभावों के बीच संबंध को समझते हैं, तो वे स्वयं को समाधान का हिस्सा मानने लगते हैं। राष्ट्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता नीति का उद्देश्य बड़े स्तर पर कौशल विकास, उच्च गुणवत्ता और नवाचार आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देकर सभी के लिए सतत् आजीविका सुनिश्चित करना है। इस संदर्भ में प्रारंभिक पर्यावरणीय जागरूकता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए समाधान भी अब सतही या तात्कालिक नहीं हो सकते। असली काम परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अभेद्य बनाना है। एक ही परीक्षा पर देश की निर्भरता को कम करने के लिए साल में अनेक प्रयास और बारहवीं के अंकों के वैकल्पिक मूल्यांकन जैसे विकल्पों पर नीतिगत स्तर पर गंभीरता से विचार करना होगा। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को वर्तमान ढाँचे से मुक्त कर संसद के अधीन एक स्वायत्त और पूरी तरह जवाबदेह संस्था बनाना होगा, जैसा कि देश के कई शिक्षाविद् माँग कर रहे हैं। आज असली परीक्षा इस देश को चलाने वाले शासकों की साख, नीयत और उनके इकबाल की है। जिस समाज में शिक्षा और न्याय केवल एक औपचारिकता बन जाएँ, वहाँ देश का भविष्य केवल एक संयोग बनकर रह जाता है, कोई गौरवशाली नियति नहीं। नौकरियों के लिए अब डिजिटल ज्ञान, समस्या सुलझाने की क्षमता और निरंतर सीखने की आवश्यकता है। भारत में हर साल लगभग एक करोड़ लोग कार्यबल में जुड़ते हैं। इस व्यापकता को उत्पादकता और साझा समृद्धि में परिवर्तित करने के लिए एक मजबूत कौशल विकास प्रणाली आवश्यक है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण का प्रभाव परिणाम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों है। संपूर्ण विश्व के लिए भूमंडलीकरण की मंशा व्यापारिक उदारता, निजीकरण और सांस्कृतिक निकटता पर आधारित है, जिसका शिकार भारत भी होता आया है। आज भारत वैश्विक रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने को आतुर है, तो इसके पीछे भूमंडलीकरण की ताकत भी शामिल है।
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