Call us: +91 7393976701
Please Wait a Moment
Menu
Dashboard
Register Now
Join Us
नगरीकरण 2 ()
Font Size
+
-
Reset
Backspace:
0
Timer :
00:00
नगरों में गांवों की अपेक्षा स्त्रियों की स्थिति अच्छी होती है। शिक्षित होने के कारण नगरों स्त्रियां न केवल अपने आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहती हैं, बल्कि अपमान एवं शोषण से बचने के लिए वे इन अधिकारों का प्रयोग भी करती हैं। नगरीय क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार से विवाह की आयु में वृद्धि तथा जन्म दर में कमी हुई है, लेकिन इससे दहेज के साथ परंपरागत तयशुदा विवाह के स्वरूप में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है। शहरी स्त्रियां नए अवसरों के साथ-साथ सुरक्षा चाहती हैं। वे अपने पुराने मूल्यों को बरकरार रखते हुए नई स्वतंत्रता का भोग भी करना चाहती हैं। तलाक और पुनर्विवाह के मामले शहरी स्त्रियों में अधिक देखने को मिलते हैं। राजनीतिक दृष्टि से भी शहरी स्त्रियां अधिक सक्रिय हैं। वे हर स्तर पर चुनाव लड़ने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। शहरों की स्त्रियां महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं और उनकी विचारधारा भी स्वतंत्र है। नगरीकरण सामाजिक गतिशीलता के लिए अधिक अवसर प्रदान करता है। आज के युग में व्यक्ति की व्यावसायिक प्रतिष्ठा अधिकतर उसकी शिक्षा पर निर्भर करती है। जितनी ऊंची शिक्षा होगी, उतनी ही ऊंची व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की संभावना बनती है, क्योंकि नगरीय समुदाय अच्छे शैक्षिक अवसर प्रदान करते हैं, इसलिए वहां प्रस्थिति और गतिशीलता के अवसर भी अधिक होते हैं। नगरीकरण के साथ अनेक समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं। नगरों में रहने के लिए पर्याप्त मकान का न मिलना एक गंभीर समस्या है। गरीब एवं मध्यम वर्ग के लोगों की मकान की जरूरतों से तालमेल करने में सरकार, उद्योगपति, पूंजीपति, उद्यमी ठेकेदार और मकान मालिक असमर्थ रहे हैं। भारत के बड़े से बड़े नगरों की एक चौथाई आबादी झोपड़-पट्टियों में रहती है। लाखों लोगों को अत्यधिक किराया देना पड़ता है। हमारी लाभोन्मुख अर्थव्यवस्था में निजी भवन मालिक और कालोनी बसाने वाले लोग धनी एवं उच्च मध्यम वर्गीय लोगों की तुलना में गरीब एवं मध्यम वर्गीय लोगों के लिए मकान बनाने में कम लाभ देखते हैं। परिणामतः शहरों में उच्च किराया देने के बावजूद उपलब्ध मकानों पर अत्यधिक भीड़ है। लगभग आधी जनसंख्या खराब मकानों में रहती है। आवास की समस्या के साथ-साथ नगरों में बेरोजगारों अथवा कम आय प्राप्त करने वाले लोगों को भोजन और वस्त्र की समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। भीड़ और लोगों की उदासीनता संबंधी समस्या शहरी जीवन की उपज है। कुछ घर तो इतनी अधिक भीड़ वाले होते हैं कि उनमें एक कमरे में पांच से छः व्यक्ति तक रहते हैं। अधिक भीड़ विचलित व्यवहार को प्रोत्साहित करती है एवं बीमारियां फैलाती है। इसके अतिरिक्त निर्वैयक्तिता के कारण नगर के लोगदूसरे लोगों के मामलों में उलझना नहीं चाहते, इसलिए अन्य लोगों के प्रति उदासीन बने रहते हैं। भारत के नगरों में परिवहन एवं यातायात की तस्वीर असंतोषजनक है।
Submit
Submit Test !
×
Dow you want to submit your test now ?
Submit