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नारी का योगदान ()
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नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, आदि शक्ति है, सद्गुणों की खान है और वह सब कुछ है जो इस प्रकट विश्व में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी वह सनातन शक्ति है, जो अनादि काल से उन सामाजिक दायित्वों का वहन करती आ रही है, जिन्हें पुरुषों का कंधा संभाल नहीं पाता। माता के रूप में मां का रूप ही सत्य, वात्सल्य ही शिव और ममता ही सुंदर है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उस राष्ट्र की आधी आबादी की भूमिका की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। आधी आबादी यदि किसी भी कारण से निष्क्रिय रहती है, तो उस राष्ट्र या समाज की समुचित एवं उल्लेखनीय प्रगति के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन भारतीय समाज में उत्तर वैदिककाल से ही महिलाओँ की स्थिति निम्न होती गई और मध्यकाल तक आते-आते समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों ने स्त्रियों की स्थिति बदतर कर दी। राष्ट्र के निर्माण में स्त्रियों का सबसे बड़ा योगदान घर एवं परिवार को संभालने के रूप में हमेशा रहा है। किसी भी समाज में श्रम विभाजन के अंतर्गत कुछ सदस्यों का घर एवं बच्चों को संभालना एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दायित्व है। अधिकांश स्त्रियां इस दायित्व का निर्वाह बखूबी करती रही हैं। घर को संभालने के लिए जिस कुशलता एवं क्षमता की आवश्यकता होती है, उसका पुरुषों के पास सामान्यतया अभाव होता है, इसलिए स्त्रियों का शिक्षित होना अनिवार्य है। यदि स्त्री शिक्षित नहीं होगी, तो आने वाली पीढ़ियां अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकतीं। एक शिक्षित स्त्री पूरे परिवार को शिक्षित बना देती है। निश्चित रूप से नारियों ने अनेक बाधाओं के बावजूद नई बुलंदियों को छुआ है और घर के अतिरिक्त भी स्वयं को सुदृढ़ता से स्थापित किया है, उन्होंने अपनी सफलताओं के ऐसे झंडे गाड़े हैं कि पुरानी रूढ़ियां हिल गई हैं। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है, जो महिलाओं की भागीदारी से अछूता हो। उसकी स्थिति में आया अभूतपूर्व सुधार उसे हाशिए पर रखना असंभव बना रहा है। नारी के जुझारूपन का लोहा सबको मानना पड़ रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद उसकी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। वास्तव में स्त्री के प्रति उपेक्षा का सिलसिला उसके जन्म के साथ ही शुरु हो जाता है और घर-परिवार ही उसका प्रथम उपेक्षा स्थल बनता है। स्त्री को उपेक्षा से मुक्ति घर की देहरी पार करने के बाद मिलती है। भारत में अदालती कानून की अपेक्षा प्रथागत कानूनों का भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः सिर्फ कानूनी प्रावधान ही महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि लोगों की मनोवृत्ति में परिवर्तन लाने की भी आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की भी है कि भारतीय समाज महिलाओं को उनका उपयुक्त स्थान दिलाने के लिए कटिबद्ध हो। उनकी मेधा एवं ऊर्जा का भरपूर उपयोग हो।
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