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मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा है और अपने लिए भी खतरे की स्थिति उत्पन्न कर ली है। अब प्रकृति का श्रेष्ठतम प्राणी होने के नाते उसका कर्त्तव्य बनता है कि वह जल संकट की समस्या के समाधान के लिए जल संरक्षण पर जोर दे। जल मनुष्य ही नहीं पृथ्वी के हर प्राणी के लिए आवश्यक है, इसलिए जल को जीवन की संज्ञा दी गई है। यदि जल की समुचित मात्रा पृथ्वी पर न हो, तो तापमान में वृद्धि के कारण भी प्राणियों का जीना मुहाल हो जाएगा। इस समय जल प्रदूषण एवं अन्य कारणों से उत्पन्न जल संकट के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है, इसलिए अपने अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि पृथ्वी की रक्षा के लिए भी उसे इस जल संकट का समाधान शीघ्र ही करना होगा और इस समस्या के समाधान के लिए उसे जल संरक्षण के महत्त्व को स्वीकार करते हुए इसके लिए आवश्यक कार्यों को अंजाम देना होगा, वरना बहुत देर हो जाएगी। विकासशील एवं विकसित देशों के मध्य विवाद की एक जड़ यह भी है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्सर्जन को ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हुए इसके उत्सर्जनकर्ता के रूप में विकासशील देशों पर नियंत्रण हेतु दबाव बना रहे हैं। वहीं विकासशील देश हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को मुख्य कारक मानते हुए विकसित देशों पर इसे बढ़ाने का आरोप लगाते रहे हैं। विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य समझौते के स्वरूप पर एकमतता न बन पाना दशकों से जलवायु परिवर्तन समझौता न हो पाने की मुख्य वजह बना हुआ है। यदि पानी का स्तर सामान्य है, तब तो बाढ़ पर नियंत्रण करने के ये उपाय कारगर होते हैं, किंतु पानी के प्रवाह में तीव्रता एवं अत्यधिक जलस्तर की स्थिति में ये उपाय किसी काम के नहीं होते। नदियों को जोड़ने की प्रस्तावित योजना को कार्यरूप देने से इस समस्या का काफी हद तक समाधान हो सकेगा। यदि बाढ़ जैसी आपदा पर प्रभावी नियंत्रण हो जाए, तो धन-जन की अपार क्षति के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में होने वाले नुकसान से भी बचाव हो सकेगा और देश समृद्ध होगा। हिमालय हमारे लिए बहुत लाभदायक है। यह उत्तर में खड़े हमारे प्रमुख प्रहरी का कार्य करता है। यहाँ भारत की अधिकतर नदियों का स्रोत है। इन नदियों से निर्मित घाटियाँ कृषि के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती हैं। गंगा नदी एवं इसका बहाव क्षेत्र इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। हिमालय के कई क्षेत्रों में जलाशय का निर्माण कर उनका उपयोग सिंचाई एवं जल-विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों के वनों से हमें ईंधन, चारा, कीमती लकड़ियाँ एवं विभिन्न प्रकार की औषधियाँ प्राप्त होती हैं।
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