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पश्चिमी सभ्यता ()
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आजकल पाश्चात्यीकरण या पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण समझने की भूल की जा रही है, जो एक बड़ी समस्या है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पाश्चात्यीकरण एवं आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएं सिद्धांततः भिन्न हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कुछ भिन्नताएं होने के बाद भी उनमें काफी समानताएं हैं। सरल शब्दों में कहें तो भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिमीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही प्रारंभ होती है। पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण किया जाता है, जिसमें आधुनिक मूल्यों के साथ-साथ कुछ रूढ़िवादी परंपराएं भी शामिल रहती हैं, जबकि आधुनिकीकरण का अर्थ है आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना एवं उसके अनुरूप व्यवहार करना। इस तरह पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत आंखे मूंदकर पाश्चात्य देशों की संस्कृति का अनुकरण नहीं किया जाता। यही कारण है कि पश्चिमीकरण के अंतर्गत मौजूद आधुनिक मूल्यों का अनुकरण करना तो तार्किक एवं उपयुक्त लगता है, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के अन्य तत्त्वों का अंधानुकरण अनुचित, किंतु पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने की होड़ में हम अपनी भाषा, संस्कृति, वेशभूषा, रहन-सहन, कला-विज्ञान, साहित्य आदि सभी कुछ भूल गये हैं। इन सबके बावजूद आज हमने आधुनिकता की दौड़ में आर्थिक के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अत्यंत प्रगति की है। शिक्षा का प्रसार, संचार साधनों का विकास, भौतिकतावादी संस्कृति का प्रचार आदि कारकों ने रूढ़िग्रस्त परंपरागत भारतीय आदर्शों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन किये हैं, जिनके फलस्वरूप रूढ़िग्रस्त, आडंबरपूर्ण एवं अतार्किक धर्म के प्रति लोगों का लगाव कम होता जा रहा है। अधिकांश लोग अब भाग्य की अपेक्षा कर्म पर विश्वास करने लग गये हैं। आधुनिकता आज समय की मांग है, लेकिन इसी के साथ-साथ भौतिकवादी दृष्टिकोण ने लोगों को यांत्रिक बना दिया है। संवेदनाएं, प्रेम, आत्मीयता का स्थान कृत्रिम एवं औपचारिक संबंधों ने ले लिया है। मनुष्य अब अधिक एकाकी एवं स्वकेंद्री बन गया है। लोगों के बीच आत्मीयता एवं आमने-सामने के स्नेहपूर्ण संबंध समाप्त होते जा रहे हैं परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन नीरस एवं अर्थविहीन होता जा रहा है। इसी कारण आज आवश्यकता भारतीय संस्कृति की परंपराओं को सहेजकर रखने के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति के आधुनिक मूल्यों को आत्मसात् करने की है। पारंपरिकता आधुनिकता को आधार प्रदान करती है, उसे शुष्क नीरस एवं बुद्धि-विलासी बनने से बचाती है, मानवीय व्यवहार को एक सम्यक् अर्थ प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति की परंपराएं हमें अपने भारतीय होने का अहसास कराती हैं, जो हमें विश्व के अन्य देशों से विकास की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय संस्कृति की अनेक परंपराएं ऐसी हैं, जो सामाजिक जीवन को अधिक सरस एवं आत्मीय बनाए रखने में योगदान करती हैं, जिससे मनुष्य की तरह जीवन जिया जा सकता है, यंत्र की तरह नहीं। वहीं पाश्चात्य संस्कृति की अनेक विशेषताएं हमारे विचारों को अधिक तार्किक एवं बौद्धिक बनाती हैं, जिन्हें हम अपने व्यवहार में क्रियान्वित कर मनुष्य जीवन को अधिक सार्थक बना सकते हैं। इस प्रकार भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में परस्पर विरोध नहीं, बल्कि अन्योन्याश्रित संबंध है।
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