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बढ़ती असमानता ()
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आर्थिक असमानता एक ऐसा सत्य है, जिसे हम सर्वव्यापी कह सकते हैं। मगर जहां तक भारत का संबंध है, यहां चंद संपन्न लोगों तक पूंजी सिमटी है और चारों तरफ वंचितों की भीड़ है। कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है लेकिन गांवों में चले जाएं, तो वहां अधिकतर किसानों की जोत दो एकड़ से कम है। इस तरह से गरीब किसानों के लिए यह जीवन निर्वाह की खेती है। पचहत्तर वर्ष गुजर गए, स्वाधीनता का अमृत महोत्सव भी मना लिया गया। मगर औसत किसान को आज भी दो जून की रोटी के लाले पड़े रहते हैं। वह आज भी पारंपरिक फसलों में ही उलझा रहता है। जब फसल पकती है, तो उसके पास सौदा करने की शक्ति भी नहीं होती कि वह सही कीमत का इंतजार करके अपनी फसल को बेचे। कैसी विडंबना है कि आज भी कई जगह खड़ी फसलों के सौदे होते हैं और आमतौर पर धनिक आढ़तिए किसानों की मजबूरी का फायदा उठा कर कम दाम पर उसकी फसल खरीद लेते हैं। नियमित मंडियों तक अधिकतर किसानों की पहुंच नहीं हो पाती। वहां गेहूं और धान की फसल सबसे पहले आसानी से बिक जाती है और विविध फसलों की क्रांति धरी रह जाती है। यहां तक कि मौसम की मार से प्रभावित फसलों को या तो ग्राहक नहीं मिलते या फिर कौड़ियों के दाम बिकती हैं। पिछले दिनों पंजाब में दलहन क्रांति के नाम पर दालों की उपज का जो प्रयोग हुआ, उसकी विफलता का एक कारण यह भी है। यहां भी अमीर लोगों का ही दखल रहा, क्योंकि सरकार ने लाल डोरा क्षेत्र के अंदर भी सहकारिता के नाम पर उनको निवेश की इजाजत दे दी है। अब हालत यह होती जा रही है कि गरीबी दूर होने का नाम नहीं ले रही। गरीब लोग जीवन निर्वाह के लिए परेशान हैं। वे अनुदान और अनुकंपा राशि पर निर्भर हो गये हैं। दूसरी ओर देश की पूंजी चंद लोगों में सिमट रही है। अभी एक प्रामाणिक रपट आई है, जिसे जी-बीस रपट कहा गया। इसमें बताया गया है कि सबसे अमीर भारतीयों की संपत्ति तेईस वर्षो में बासठ फीसद बढ़ी है। आर्थिक विश्लेषक कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों से गरीब यथास्थिति में हैं। वे किसी तरह गुजर-बसर कर रहे हैं। हालांकि उनके लिए कई कल्याणकारी योजनाएं घोषित की गईं, लेकिन उन योजनाओं का हश्र यह हुआ कि गरीब को अमीर बनाने की यह कवायद अनुकंपा और अनुदान संस्कृति का शिकार हो गई। दुनिया भर में जहां 2.3 अरब लोग अब भी खाद्य असुरक्षा के शिकार हैं वहीं भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या 33.5 करोड़ से अधिक है। यानी बड़ी संख्या में नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। दुनिया की आधी आबादी जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। भारत में भी ये सेवाएं इतनी महंगी हैं कि आम आदमी अस्पतालों में उपचार कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पंजाब में बड़े-बड़े अस्पतालों ने अपनी शाखाएं खोल ली हैं। चंडीगढ़ और मोहाली में ऐसा कोई बड़ा अस्पताल नहीं, जिनके सूचना बोर्ड नजर नहीं आते हों। अब तो इस तरह के बोर्ड जलंधर तक नजर आने लगे हैं। लेकिन सवाल है कि कितने निर्धन लोग इन अस्पतालों में पहुंच पाते हैं? सरकार ने मुफ्त उपचार की योजनाएं घोषित कीं, लेकिन चिकित्सा जगत तो निजी क्षेत्र को ही अपना मुक्ति द्वार मानता है। मगर यह भी सच है कि समय पर सरकार से भुगतान न होने का बहाना बना कर अस्पतालों में गरीब मरीजों का उपचार नहीं किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के लगभग हर राज्य में औसत लोग अपनी आय से सेहत पर खर्च के कारण जीवन की दूसरी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हो जाते हैं और धीरे-धीरे गरीबी का जीवन जीने लगते हैं। अब जरा बहुमंजिला इमारतों की ओर देखिए। उनकी चकाचौंध विस्मित करती है। जबकि बड़ी संख्या में लोग जैसे-तैसे घर बना कर रहते हैं। इनमें भी एक बड़ी आबादी किराए के घरों में रहती है। विश्व स्तर पर केवल एक फीसद लोगों ने ही चार वर्ष में अपनी नई संपदा के बल पर कुल संपदा के चौवालीस फीसद हिस्से पर कब्जा कर लिया है। भारत के लिए तो यह कथन आम है कि यहां दस फीसद लोग नब्बे फीसद संपदा पर कब्जा जमाए हैं और नब्बे फीसद के हिस्से में केवल दस फीसद संसाधन आते हैं। पंजाब में फैले हुए बड़े-बड़े फार्म हाउस उन अमीरों की अभी-अभी प्राप्त नवसंपदा की ओर इशारा करते हैं, जिन्होंने कर से बचने के लिए खेती-बाड़ी में पैसा लगा दिया और फार्म हाउस बना दिये। चाहे कृषि से आमदनी कुछ भी नहीं हुई हो, लेकिन अमीरों के राजमहल पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर खड़े हो गये हैं। तीसरी दुनिया के देशों में सबसे अमीर एक फीसद लोगों ने 74 फीसद संपदा पर अधिकार जमा लिया है। खास बात यह है कि इस संपदा के बढ़ने की गति बहुत तेज है। आर्थिक असमानता न केवल पूरी दुनिया में बढ़ गई है, बल्कि यह तस्वीर भारत में भी दिख रही है। इसके जोखिम भी कम नहीं। एक तो यही कि अगर एक फीसद के पास सारी संपदा जमा हो जाएगी, तो क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक नहीं होगा। ऐसे धनकुबेर क्या अधिनायकवाद की स्थिति पैदा नहीं करेंगे। विश्लेषक कहते हैं कि ज्यों-ज्यों धनवान और धनवान बनेंगे, त्यों-त्यों संबंधित देश में लोकतांत्रिक पतन की संभावना बढ़ती जाएगी। अब जहां तक समाज का चेहरा बदलने का सवाल है, तो ऐसी घोषणाएं हर राजनीतिक दल कर रहा है। इसे बदलाव के पहलुओं के तौर पर यह कहा जाता है कि हम भ्रष्टाचार को शून्य स्तर तक ले आएंगे।
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