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कृतज्ञता व्यक्त कर हम सामाजिकता का निर्वाह करते हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य के साथ संस्थाओं एवं समूहों के उद्देश्य भी परिवर्तित होते हैं। अतः किसी ऐसी संस्था का समापन सिर्फ उद्देश्यों अथवा वैश्विक बदलावों के आधार पर कर दिया जाना तार्किक नहीं कहा जा सकता है। इस हेतु बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। वैयक्तिक, सामुदायिक और सरकारी प्रयासों को सम्मिलित करता है। आज की इस वैश्विक व्यवस्था में अपने सदस्य देशों के संरक्षण, पुनरोद्धार तथा एक मंच पर एकत्रित होकर अपनी समस्याओं के विषय में व्यापक विचार-विमर्श करने तथा उन समस्याओं से लड़ने के लिए समाधान निकालने के रूप में गुट निरपेक्ष आंदोलन हमेशा प्रासंगिक रहेगा। परिवार बच्चों को प्रकृति से जोड़ने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़ लगाना, घर में बागवानी करना, पार्क जाना या प्रकृति के बीच समय बिताना आदि गतिविधियाँ बच्चों में प्रकृति के प्रति लगाव और जिम्मेदारी की भावना विकसित करती हैं। आमतौर पर धर्म को संप्रदाय से जोड़ दिया गया है। धर्म, व्यक्ति और व्यष्टि के बीच तादात्म्य की फलश्रुति है। लैंगिक पूर्वाग्रह से युक्त उपरोक्त दोनों व्यवस्थाएँ व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के लिए समान रूप से हानिकारक हैं। परिवार बच्चों को प्रकृति से जोड़ने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़ लगाना, घर में बागवानी करना, पार्क जाना या प्रकृति के बीच समय बिताना आदि गतिविधियाँ बच्चों में प्रकृति के प्रति लगाव और जिम्मेदारी की भावना विकसित करती हैं। परिवार ज्ञान और व्यवहार के बीच सेतु का कार्य करते हैं। विद्यालय में सीखी गई बातें तब प्रभावी होती हैं, जब उन्हें घर पर भी अपनाया जाता है। जल संरक्षण या कचरा पृथक्करण जैसी आदतें जब दैनिक जीवन में लागू होती हैं, तो वे स्थायी बन जाती हैं। इस परिवर्तित परिदृश्य में दृष्टिकोण का विस्तार आवश्यक है। कौशल को गतिशील क्षमता के रूप में, शिक्षा को सार्थक अधिगम के रूप में और विकास को गरिमा, समावेशन और सृजनशीलता के समन्वय के रूप में समझना होगा। नवाचार इस परिवर्तन का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। चाहे वह जमीनी स्तर के पारंपरिक ज्ञान हों या अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्र, भारत का भविष्य इन्हीं के समन्वय में निहित है। भोजपत्रों की संख्या में यह वृद्धि हिमालय के पर्यावरण और उसकी आबोहवा विकास के लिए उपयुक्त है। अंततः विकसित भारत का निर्माण केवल नीतियों या प्रौद्योगिकी से नहीं, बल्कि उसके लोगों की क्षमता और उनके सशक्तीकरण से होगा। ऐसी क्षमता, जो परिवर्तन के अनुरूप ढल सके, सृजन कर सके और भविष्य को दिशा दे सके। आगे बढ़ते हुए भारत को ऐसे समाज का निर्माण करना होगा, जहाँ केवल विकास नहीं, बल्कि क्षमता को महत्त्व मिले। केवल अवसर नहीं, बल्कि तैयारी पर ध्यान दिया जाए और केवल प्रगति नहीं, बल्कि समावेशन सुनिश्चित हो।
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