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Editorial 10 november ()
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प्रौद्योगिकी के इस दौर में आज अधिकतर कार्य तकनीक के जरिए होने लगे हैं। घरों की साफ-सफाई से लेकर दफ्तर के कार्यों में मशीनों की मदद ली जा रही है। यानी हम तकनीक पर इतने ज्यादा निर्भर हो गए हैं कि उसमें जरा-सी खराबी आने पर सारी व्यवस्था ठप पड़ जाती है। इसमें दो राय नहीं कि तकनीक का इस्तेमाल आज के समय की जरूरत है, लेकिन सुरक्षात्मक और वैकल्पिक उपायों का होना भी बेहद जरूरी है, नहीं तो दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर शुक्रवार को जो स्थिति उत्पन्न हुई, उस तरह का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। गौरतलब है कि तकनीकी खामी के कारण यहां आठ सौ से अधिक घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में विलंब हुआ और कुछ उड़ानें रद्द कर दी गईं, जिससे यात्रियों को खासी परेशानी हुई। प्रभावित उड़ानों में आगमन और प्रस्थान दोनों शामिल थीं। शुरु में इसे साइबर हमले से जोड़कर देखा जा रहा था, मगर बाद में सरकार और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि आटोमैटिक मैसेज स्विचिंग सिस्टम में तकनीकी गड़बड़ी की वजह से समस्या उत्पन्न हुई। सवाल है कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए हवाई अड्डे पर पहले से माकूल वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी? दरअसल, एएमएसएस वह प्रणाली है, जिससे हवाई यातायात नियंत्रित होता है। इसमें किसी भी तरह की तकनीकी खराबी आने से उड़ानों की आवाजाही प्रभावित होना तय है। इससे न केवल विमान यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ती है, बल्कि हवा में उड़ रहे विमानों के लिए भी जोखिम की स्थिति पैदा हो सकती है। दिल्ली हवाई अड्डे पर इन तकनीकी खामी के कारण विमानों की उड़ान में पचास मिनट से एक घंटे तक की देरी हुई। इस कारण बोर्डिंग गेट के पास यात्रियों को उनकी उड़ान के पुनर्निर्धारित समय की सूचना देने की उचित व्यवस्था का अभाव भी साफ नजर आया। सवाल है कि ऐसी स्थिति में यात्री परेशान न हों या अफरा-तफरी का माहौल पैदा न हो, इसके लिए पर्याप्त इंतजाम करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की जाती है? संचालन का कार्य संभालने वाली कंपनी की क्या यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए एहतियाती व्यवस्थागत इंतजाम करने को प्राथमिकता दे। दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से प्रतिदिन पंद्रह सौ से अधिक उड़ानों का संचालन होता है। यह तथ्य भी सामने आया है कि हवाई अड्डे पर दो दिनों से हवाई यातायात नियंत्रण प्रणाली में रुक-रुक कर तकनीकी अड़चन आ सकती है। इसके बावजूद न तो इस खामी को समय पर दुरुस्त किया जा सका और न ही वैकल्पिक उपायों को चुस्त-दुरुस्त किया गया। तकनीकी खराबी के बाद हवाई यातायात नियंत्रक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर गैर कंप्यूटरीकृत तरीके से काम कर रहे थे, जिसमें समय लगने के कारण उड़ानों में देरी हुई और यह सिलसिला पंद्रह घंटे से अधिक समय तक चलता रहा। जाहिर है, इस व्यवस्था की हर कोण से जांच कराने की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से सबक लेकर खासतौर पर तकनीकी व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर हर स्तर पर सतर्कता बरती जाएगी, ताकि भविष्य में यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो। हरियाणा के हिसार में एक पुलिसकर्मी की हत्या कानून से बेखौफ और हिंसक होते माहौल की त्रासद हकीकत है। लोगों और खासतौर पर युवाओं के बीच सुनने, समझने एवं सोचने की प्रवृत्ति इस कदर कम देखी जा रही है कि उचित सलाह या मनाही के बाद उस पर विचार करने के बजाय वे तुरंत आक्रामक हो जाते हैं। लोग अपनी मनमानी के आगे दूसरों की मुश्किलों पर गौर करना जरूरी नहीं समझते। यह सामाजिक सरोकार में बड़ी गिरावट है, लेकिन इसकी एक वजह सरकार की वह नाकामी भी है, जिसमें कानून का खौफ हर जरूरी जगह पर नहीं दिखता। अव्वल तो यह व्यक्ति की अपनी समझ होनी चाहिए कि उसकी गतिविधियों से किसी को परेशानी तो नहीं हो रही, लेकिन विडंबना यह है कि गलत करने पर रोकने या समझाने-बुझाने पर आजकल लोग इस कदर उग्र हो उठते हैं कि वे किसी की जान लेने से भी नहीं कतराते। हिसार में एक पुलिस उपनिरीक्षक ने सिर्फ इतना भर किया था कि उन्होंने घर के आगे हंगामा कर रहे लोगों को रोकने की कोशिश की थी। उनके डांटने पर युवक चले गए, लेकिन बाद में आकर उपनिरीक्षक पर ईंटों से हमला कर उनकी हत्या कर दी। यह अफसोसनाक है कि आजकल गलत कार्यों पर टोकने भर से कुछ सामान्य उत्पाती जघन्य अपराध करने से भी नहीं हिचकते हैं। अनेक वजहों से सामाजिकता के कमजोर होते तंतु और सोचने-समझने की भटकती दिशा ने खासतौर पर बहुत सारे युवाओं को उत्तेजना और उन्माद को ही सच मानने की राह पर ला दिया है। इसके समांतर पुलिस और कानून व्यवस्था का खौफ शायद ही कहीं दिखता है, ताकि युवाओं के बीच अपराध की ओर बढ़ते कदम रुक सकें। ऐसी स्थिति में किसी भी वजह से एक जगह जमा हुए कुछ युवक न केवल दूसरे की सुविधाओं या परेशानियों को नजरअंदाज करते हैं, बल्कि अराजकता को अपना हक समझने लगते हैं। जब इसके परिणाम के तौर पर कोई जघन्य अपराध घटित हो जाता है, तब जाकर पुलिस और प्रशासन की नींद खुलती है, लेकिन यह महज जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने तक सीमित होकर रह जाती है। सवाल है कि लगातार चिंता पैदा करने वाली इस सूरत के लिए कौन जिम्मेदार है और इसका भुक्तभोगी आखिर कौन होगा? हमने क्या कभी थकान को ध्यान से देखा है? जैसे दिन ढलने के बाद किसी पेड़ की छाया लंबी हो जाती है धीमी, शांत, बिना किसी शोर के। थकान भी कुछ वैसी ही होती है, बस शरीर के जरिए मन की कहानी कहती है। हमारे समय में थकान एक नकारात्मक शब्द बन गया है। यह कहा जाता है कि थकना नहीं है, रुकना नहीं है, चलते रहना है, लेकिन कोई नहीं कहता कि ठहरो, सांस लो, महसूस करो। दरअसल, हम एक ऐसी सभ्यता के नागरिक है, जहां रफ्तार को सफलता और ठहराव को विफलता समझा गया है। इस तेज जीवन में थकान से डरना सिखाया गया है, जैसे वह कोई कमजोरी हो। जबकि सच यह है कि थक जाना सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमने दिन को पूरी नीयत से, पूरी ईमानदारी से जिया। जो नहीं थकता, शायद उसने अभी तक शुरु ही नहीं किया। थकान केवल शरीर की बात नहीं है, यह आत्मा की भाषा है। यह उस श्रम की स्मृति है जो दिन भर हमारे भीतर से होकर गुजरी होती है। सड़क किनारे एक रिक्शेवाला अपनी सीट पर झुका बैठा था।
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