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राष्ट्र की एकता ()
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हम जब-जब असंगठित हुए, हमें आर्थिक व राजनीतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी। हमारे विचारों में जब-जब संकीर्णता आई, आपस में झगड़े हुए। हमने जब कभी नये विचारों से अपना मुख मोड़ा, हमें हानि ही हुई, हम विदेशी शासन के अधीन हो गये। ये बातें स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के दौरान कही थीं। सचमुच राष्ट्रीय एकता सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होती है। राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य है राष्ट्र के विभिन्न घटकों में परस्पर एकता, प्रेम एवं भाईचारे का कायम रहना, भले ही उनमें वैचारिक और आस्थागत असमानता क्यों न हो। भारत में कई धर्मो एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अंतर तो है ही, साथ ही उनकी भाषाएं भी अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत रहते हैं, उसे राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का प्रयास किया गया, भारत का एक-एक नागरिक सजग होकर ऐसी असामाजिक शक्तियों के विरुद्ध खड़ा दिखाई दिया। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीयता के लिए भौगोलिक सीमाएं, राजनीतिक चेतना और सांस्कृतिक एकबद्धता अनिवार्य होती हैं। यद्यपि प्राचीन काल में हमारी भौगोलिक सीमाएं इतनी व्यापक नहीं थीं और यहां अनेक राज्य स्थापित थे, तथापि हमारी संस्कृति और धार्मिक चेतना एक थी। कन्याकुमारी से हिमालय तक और असोम से सिंध तक भारत की संस्कृति और धर्म एक थे। यही एकात्मकता हमारी राष्ट्रीय एकता की नींव थी। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी अलग परम्परा, रीति-रिवाज व आस्थाएं थी, किंतु समूचा भारत एक सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध था। इसी को अनेकता में एकता एवं विविधता में एकता कहा जाता है और यही पूरी दुनिया में भारत की अलग पहचान स्थापित कर इसके गौरव को बढ़ाता है। हम जानते हैं कि राष्ट्र की आंतरिक शांति तथा सुव्यवस्था और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतंत्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार, अपनी स्वतंत्रता की रक्षा एवं राष्ट्रों की उन्नति के लिए भी राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। इतिहास के अध्ययन से हमें पता चलता है कि प्राचीन काल में समूचा भारत एक ही सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध था, किंतु आंतरिक दुर्बलता के कारण विदेशी शक्तियों ने हम पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। इन विदेशी शक्तियों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करना शुरू किया, जिससे हमारी आस्थाओं एवं धार्मिक मूल्यों का धीरे-धीरे पतन होने लगा। राष्ट्रीय एकता परिषद् के अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने कहा था कि भारत में 1866 ईस्वी से पूर्व कभी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए। यहां सदियों से विभिन्न धर्मो के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं, किंतु अंग्रेजों के शासनकाल में यहां हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए। यह अंग्रेजों की सोची-समझी कूटनीतिक चाल थी।
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