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वस्तुतः हमारे संविधान और विधानों की सार्थकता इसी में है कि ये अपने मूल आदर्शों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता को दृष्टिगत रखते हुए समावेशी विकास और वित्तीय समावेशन का माध्यम बनें। यदि सरकार द्वारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर बनाए गए कानूनों और योजनाओं का लाभ समाज के वंचित वर्गों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, सीमांत कृषकों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, प्रवासियों, शरणार्थियों तक नहीं पहुँच पा रहा है, तो उनकी सार्थकता निश्चय ही खतरे में पड़ जाती है। यदि जीवन की असली खोज सार्थकता की उपलब्धि न होती, तो तथाकथित सफलता के शिखर पर बैठे बिल गेट्स, वारेन बफेट जैसे उद्यमी मानव कल्याण के लिए अपनी अकूत संपत्ति का बड़ा भाग दान न करते, किरण बेदी तिहाड़ जेल में सुधार और पुलिस सुधारों में नवोन्मेष नहीं करतीं, राजेन्द्र सिंह और सुंदरलाल बहुगुणा जल संरक्षण व पर्यावरण की अलख नहीं जगाते और कैलाश सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से बाल अधिकारों का झंडा बुलंद नहीं करते। औद्योगीकरण और वैश्वीकरण के कारण मानव एक मशीनी मानव के रूप में रूपांतरित हो गया है, जिसमें व्यक्तिवाद एवं भौतिकतावाद का पक्ष हावी होने के कारण नैतिक अंतराल की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस नैतिक अंतराल के कारण विश्व में गरीबी, भ्रष्टाचार, नस्लभेद, आतंकवाद, लिंगभेद, युद्ध, शरणार्थी समस्या, जलवायु परिवर्तन समेत कोरोना महामारी जैसे ज्वलंत मुद्दे मानव समुदाय के समक्ष चुनौती बने हुए हैं। इन मुद्दों का समाधान न तो अकेले रूमानी मनुष्य के द्वारा किया जा सकता है और न ही वैज्ञानिक मनुष्य के द्वारा। इन समस्याओं को दूर करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नैतिकता, करुणा, सहिष्णुता जैसे पक्षों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। हालाँकि, उल्लेखनीय है कि ऐसी अनिवार्यता नहीं है कि पालना झुलाने वाले हाथ माता के ही हों अथवा केवल माता ही पालना झुलाती हो। अनेक बार यह देखने को मिलता है कि माता की अनुपस्थिति में परिवार के अन्य व्यक्तियों अथवा किसी पालक द्वारा बच्चों की परवरिश की जाती है। यह भी संभव है कि माता के होते हुए भी ये सभी लोग बच्चे की परवरिश में अपना-अपना योगदान देते हों। इस प्रकार से योगदान देने वालों में परिवार के लोगों के साथ-साथ अध्यापक, समाज, राष्ट्र व संस्कृति भी वे महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो किसी बच्चे का पालना झुलाने वाले हाथ की भूमिका का निर्वाह करते हैं अर्थात् उस बच्चे की परवरिश में इनका भी महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। राष्ट्र, समाज व संस्कृति अदृश्य व अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों की परवरिश में अपना योगदान देते हैं तथा शेष सामान्यतः प्रत्यक्ष रूप से यह भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बच्चे की परवरिश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामान्यतः माताओं पर ही रहती है।
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