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अध्यक्ष महोदय, समग्र रूप से देखा जाए, तो पिछले एक दशक के दौरान आरंभ की गई सांस्कृतिक पहल में एक सुसंगत दृष्टि दिखाई देती है। चाहे वह पांडुलिपियों का संरक्षण, शैक्षिक सुधार, सांस्कृतिक मानचित्रण, विरासत संरक्षण, संग्रहालयों का विकास, तीर्थस्थलों का पुनरुद्धार, सांस्कृतिक कूटनीति हो अथवा सार्वजनिक संस्थानों और राष्ट्रीय प्रतीकों की पुनर्कल्पना, इन सभी प्रयासों का उद्देश्य विकास को ऐतिहासिक स्मृति से तथा नवाचार को परंपरा से जोड़ना है। अब संस्कृति को किसी गौण विषय के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि शासन, शिक्षा, कूटनीति, पर्यटन और राष्ट्रीय विकास के एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। मन चित्त की आड़ी-तिरछी रेखाओं पर चलता है। इन रेखाओं को बनाने का काम है विचारों और स्मृतियों का। जीवन सरल और सहज हो इसके लिए जरूरी है कि ये रेखाएँ भी सीधी रहें। मन जहाँ तक संभव हो, वर्तमान में ही टिका रहे। कहना तो आसान है, पर करना कठिन। फिर भी कोशिश की जानी चाहिए इसे करने की। मानसिक स्वास्थ्य और शांति के लिए बड़ा जरूरी है यह। यादों को पूरी तरह मिटा देना तो शायद संभव नहीं, बस ऐसा कुछ किया जाए कि वे आएँ और चली जाएँ। चाय-पानी के लिए घर में जम कर बैठ न जाएँ। शेयर बाजार से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात के दौरान बालेन शाह ने स्वीकार किया कि सरकार की नीतियों के कारण निवेशकों के भरोसे में कमी आई है। राष्ट्रीय सीमाओं से परे भी भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नई दिशा प्रदान कर रहा है। सांस्कृतिक कूटनीति भारत की वैश्विक उपस्थिति का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन गई है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का विश्वव्यापी उत्सव एक प्राचीन भारतीय साधना पद्धति को वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन में परिवर्तित कर चुका है। इसी प्रकार आयुर्वेद, बौद्ध धर्म, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और भारतीय दर्शन के प्रति विश्व भर में बढ़ती रुचि भारत की सॉफ्ट पावर के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। भारत मंडपम् में स्थापित नटराज की विशाल कांस्य प्रतिमा ब्रह्मांडीय व्यवस्था भारत की उस गहन सभ्यतागत समझ का प्रतीक है, जिसमें सृष्टि, संरक्षण और परिवर्तन को परस्पर जुड़े हुए आयामों के रूप में देखा जाता है। नटराज अर्थात् नृत्य के अधिपति, ब्रह्मांड की गतिशील लय तथा ज्ञान, संस्कृति, विज्ञान और अध्यात्म के बीच सामंजस्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे तत्त्व जिन्होंने सहस्राब्दियों से भारतीय चिंतन को आकार दिया है। जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन स्थल पर इस प्रतिमा की स्थापना ने वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत ज्ञान का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया तथा संतुलन, सृजनशीलता और सार्वभौमिक कल्याण के एक शाश्वत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
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