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Khand 2 Exercise 11 ()
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भाइयो, आखिरकार एक लंबे संघर्ष के बाद जो कि मुख्य रूप से अहिंसात्मक था और जिसका नेतृत्व ऐसे विलक्षण व्यक्ति ने किया, जो अहिंसा और सत्य को ईश्वर का पर्याय मानता था, परंतु स्वतंत्रता के किनारे पहुँचने के अंतिम चरण में भारत को खून की नदी में से होकर गुजरना पड़ा और यह नदी भारतीयों ने ही खोदी थी तथा इसमें भारतीयों का ही खून बह रहा था। अभूतपूर्व पैमाने पर लोगों का निष्क्रमण हुआ। पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों, बूढ़ों, बीमारों समेत एक करोड़ व्यक्ति जिनके शरीरों से खून चूकर भारत की भूमि तक को रंग रहा था, भारत के एक ओर से दूसरी ओर गए उन्होंने अपने पीछे न केवल मकान और जमीनें छोड़ी, बल्कि अपने घर के व्यक्तियों के मृत शरीर भी छोड़े। स्वतंत्र भारत के किनारे तक पहुँचने के लिए देश को यह मूल्य चुकाना पड़ा और वह दो प्रभुतासंपन्न राष्ट्रों भारत और पाकिस्तान में विभाजित हो गया। यह 15 अगस्त, 1947 की बात है। कांग्रेस ने जो वास्तविक रूप से 1885 से भारत की राष्ट्रीय वाणी थी, हमेशा भारत की एक राजनीतिक इकाई के रूप में संकल्पना की थी। कांग्रेस को अंत में भारत का विभाजन स्वीकार करना पड़ा। वैसे तो यह स्वीकृति सहमति से दी गई थी, परंतु वास्तविक रूप में देखा जाए तो यह ब्रिटिश शासकों द्वारा पिछले कई दशकों से उत्पन्न की गई परिस्थितियों के दबाव के कारण था। फूट डालो और राज करो की नीति पहले-पहल अलीगढ़ मुस्लिम कॉलेज की स्थापना के साथ शुरू की गई। एक दूसरे के बाद आने वाले तीन ब्रिटिश प्रिंसिपलों ने पृथकता का विचार मुस्लिम नेताओं और छात्रों के मन पर बैठाया। सर सैयद अहमद को विभाजनमूलक विचारों को फैलाने के लिए उनसे हर प्रकार की मदद मिली। हम यह नहीं कहेंगे कि इसमें हिंदुओं का कोई दोष नहीं था, जो मुसलमानों से सामाजिक स्तर पर अलगाव बनाए रखते थे और आर्थिक दृष्टिसे उनका शोषण करते थे। अलीगढ़ कॉलेज के अधिकारियों को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपजाऊ भूमि मिली। यह सब कुछ पिछली शताब्दी के अंतिम वर्षों में हुआ। इन्होंने सोच-समझकर राष्ट्रीय मुसलमानों की उपेक्षा करने की नीति अपनाई। 1947 में कांग्रेस के पास विभाजन स्वीकार करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था, विशेषकर गंभीर सांप्रदायिक झगड़ों के कारण जो कि गृह युद्ध का रूप धारण कर रहे थे। जिन्ना ने यह सुझाव भी दिया कि सांप्रदायिक आधार पर आबादी की अदला-बदली की जाए। शायद वह बेहतर समाधान होता, क्योंकि इससे शायद वे क्रूर कृत्य न होते, जो बहुत लंबे काल तक पड़ोस में रहने वालों के साथ उनके पड़ोसियों ने किए। विभाजन को स्वीकार करते हुए कांग्रेस ने 15 जून, 1947 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पास किया गया था। इसमें कहा गया था पिछली दो पीढ़ियों के श्रम और बलिदान की नहीं, बल्कि भारत का विस्तृत इतिहास और परंपरा भी इस मूलभूत एकता की साक्षी है।
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