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विकलांगता 2 ()
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निश्चय ही विकलांग व्यक्ति समान अवसर, अधिकार, संरक्षण और पूर्ण भागीदारी कानून के लागू होने और केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से विकलांगता को रोकने हेतु देशभर में किए गए प्रयासों के परिणामस्वरूप विकलांगता के मुद्दे और विकलांगों की समस्याओं के प्रति आम लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ है और विकलांग लोग भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं, पर देश में अभी भी विकलांगों को बस, ट्रेन आदि वाहनों, सार्वजनिक भवनों, शिक्षण संस्थानों, कार्योलयों आदि में प्रवेश आदि की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। यहाँ के गाँवों की स्थिति तो और भी बदतर है। देश के मेट्रोपोलिटन शहरों में जहाँ ये सुविधाएँ थोड़ी-बहुत हैं भी, वहाँ विकलांगों की समस्या के समाधान हेतु दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करने के प्रति लोग लापरवाह देखे जाते हैं। सभी जनसुविधाओं का लाभ विकलांग व्यक्ति उठा सके, इसके लिए आवश्यक है कि फुटपाथों, बस पड़ावों, उद्यानों, सार्वजनिक शौचालयों, स्कूलों, कॉलेजों व कार्यालयों में ऐसी व्यवस्था की जाए कि व्हीलचेयर पर बैठा व्यक्ति बिना किसी की मदद के अपने सभी सामान्य कार्यों को सुचारु रूप से पूर्ण कर ले। नेत्रहीनों व कमजोर दृष्टि वालों के लिए भी ब्रेल लिपि में चिह्न व सूचनाएँ उपलब्ध होनी चाहिए, किंतु विकलांगों को उच्च कोटि की सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ हमें उनके प्रति अति संवेदनशील दृष्टिकोण भी अपनाना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर, 2014 में केंद्र तथा राज्य सरकारों को सभी सरकारी नौकरियों में विकलांगों के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण कोटा निर्धारित करने का निर्देश दिया है। विकलांग व्यक्ति से संबद्ध पीडब्लूडी अधिनियम,1995 के पारित होने के उन्नीस वर्षों में विकलांगों को इसका अधिकार न मिलने पर मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने निराशा व्यक्त की। केंद्र सरकार की ओर से विकलांगो को तीन प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की दलील को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि नियुक्ति एक व्यापक अवधारणा है और केंद्र इसकी संकीर्ण व्याख्या दे रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरी की सभी श्रेणियों में नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति तथा पदोन्नति में विकलांगों के लिए आरक्षण की अनुमति दी है। खंडपीठ ने आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होने के सिद्धांत को भी विकलांगों का उदाहरण देते समय लागू नहीं होने की बात की है। हमारी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने कहा था विकलाँगों को दया नहीं सहानुभूति की आवश्यकता है। उन्हें दान नहीं बल्कि अपने अन्य मानव मित्रों की तरह अधिकार चाहिए। यह समस्या केवल कानून से हल नहीं की जा सकती, इसके लिए जनता के व्यवहार में परिवर्तन आवश्यक है। किंतु वास्तविकता यह है कि आज भारत हर क्षेत्र में विकास कर तेजी से विकसित देशों की श्रेणी में अग्रसर हो रहा है, बावजूद इसके विकलांगों के प्रति हमारे समाज के दृष्टिकोण में अपेक्षित बदलाव नहीं हुए हैं। आज भी आमतौर पर विकलांगता को पूर्व जन्म के कर्मों से जोड़कर देखा जाता है और विकलांग व्यक्तियों को दया का पात्र समझा जाता है।
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