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वरिष्ठ नागरिकों की समस्याएँ ()
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जीवन मुख्यतः तीन अवस्थाओं में बाँटा गया है। ये अवस्थाएँ बाल्यावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था हैं। जिस प्रकार शैशव अर्थात् बाल्यावस्था के बाद युवावस्था आती है, ठीक उसी प्रकार युवावस्था के बाद वृद्धावस्था आती है। बाल्यावस्था किसी भी व्यक्ति के जीवन का स्वर्णिम काल होता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति अपने बचपन को फिर से जीने की इच्छा रखता है। जीवन में सृजनात्मकता तथा रचनात्मकता का संचार करने वाली युवावस्था साहस, उमंग और जोश से भरी होती है। साधारणतः अपने जीवन की अधिकांश उपलब्धियाँ मनुष्य इसी अवस्था में अर्जित करता है। इसीलिए हर कोई सदैव युवा रहने का स्वप्न देखता है, लेकिन वृद्धावस्था इन दोनों अवस्थाओँ से भिन्न है। मनुष्य प्राचीन काल से ही लम्बी आयु की कामना करता आया है और यह भी सत्य है कि वह कभी वृद्ध नहीं होना चाहता, परंतु युवा होने के बाद शरीर का वृद्ध होना प्रकृति का सनातन नियम है और हम सब इस नियम से बँधे हुए हैं, बावजूद इसके अनेक शारीरिक तथा मानसिक समस्याओं का सामना करने के कारण कोई भी व्यक्ति वृद्धावस्था को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाता है। वृद्धावस्था जीवन का वह सोपान होती है, जब व्यक्ति अपने जीवन की संध्यावेला का अनुभव करता है। इस अनुभव का सबसे पहला माध्यम बनता है उसका अपना शरीर। इस अवस्था में मनुष्य की शारीरिक क्षमता में कमी आ जाती है, जिससे उसकी निर्भरता दूसरों पर बढ़ जाती है। शरीर की सभी इंद्रियों की गति धीमी पड़ जाती है और व्यक्ति धीरे-धीरे उन पर अपना नियंत्रण खोने लगता है। शरीर कमजोर और अशक्त बन जाता है। छोटी-छोटी बीमारियाँ भी व्यक्ति को बड़ा असहाय बना देती है। जो व्यक्ति युवावस्था में अपने स्वास्थ्य के प्रति बेहद सचेत होते हैं, वृद्धावस्था में वे भी रोगों से बच नहीं पाते। इस अवस्था में व्यक्ति रोगमुक्त रह जाए, ऐसा होना लगभग असंभव है। इसीलिए चिकित्सकों से नियमित रूप से परामर्श करना उनके जीवन का अंग बन जाता है। यह सत्य है कि उम्र के इस पड़ाव पर वरिष्ठ नागरिकों की अपनी अनेक शारीरिक व्याधियाँ सिर उठा लेती हैं, परंतु यह उनकी वास्तविक समस्या नहीं है। उनकी वास्तविक समस्या मानसिक है। सरकारी अथवा गैर सरकारी संगठनों में वेतनभोगी कर्मचारियों को एक निर्धारित आयु के बाद सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। यह मान लिया जाता है कि अब व्यक्ति शारीरिक और मानसिक श्रम के योग्य नहीं रहा, चाहे वह व्यक्ति स्वस्थ ही क्यों न हो। इसके बाद उसके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आने लगती है। जैसे ही व्यक्ति की आर्थिक उपयोगिता में कमी आती है, वह सामाजिक रूप से भी अनुपयोगी समझ लिया जाता है। इससे व्यक्ति को एक तरफ तो सीमित तथा अल्प धन की उपलब्धता के कारण आर्थिक कष्ट उठाना पड़ता है, तो दूसरी ओर समाज एवं परिवार की नजरों में बोझ, अनुपयोगी तथा फालतू आदि समझे जाने से मानसिक पीड़ा होती है।
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