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क्षेत्रवाद की समस्या भाग 2 ()
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गौरतलब है कि बार-बार नए राज्यों के गठन से देश की एकरूपता एवं अखंडता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और क्षेत्रवाद प्रबल होता जाता है। आवश्यकता पड़ने पर प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों में जिलों की संख्या बढ़ाना विकास की दृष्टि से ज्यादा फायदेमंद सिद्ध होगा। इससे विकास को गति मिलेगी। ज्यादातर स्थितियों में देखा जाता है कि नेतागण अपना उल्लू सीधा करने के लिए या राजनीतिक लाभ के लिए ही जनता को अलग राज्य की माँग हेतु उकसाते हैं। प्रायः नए राज्यों के गठन की माँग के वक्त विकास का हवाला दिया जाता है, किंतु राज्यों के पुनर्गठन से यदि विकास को गति मिलती, तो इसका उदाहरण हमें अब तक कई बार मिल चुका होता। अब तक एक भी ऐसा नया राज्य सामने नहीं आया है, जिसकी विकास दर में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई हो। अतः यदि हमें देश का विकास करना है और इसकी अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखना है, तो हमें नए राज्यों का नहीं, बल्कि विकास की नीतियों का पुनर्गठन करना होगा। इस तरह यह स्पष्ट है कि भाषा, क्षेत्र या विकास का हवाला देकर नए राज्यों की माँग करना और क्षेत्रवाद की समस्या को जन्म देना सर्वथा अनुचित है। क्षेत्रवाद हमारे देश की संघीय संरचना पर तीखा प्रहार करके हमारी राष्ट्रीय एकता को क्षीण करता है। क्षेत्रीयता एवं प्रांतीयता की भावना जब-जब राष्ट्रीय हितों से संघर्ष करती है, तब-तब देश की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा उत्पन्न होता है। पिछले एक दशक के दौरान इन्हीं सब कारणों से एशिया के अनेक देशों में विखंडन हो चुका है। केंद्र में गठबंधन सरकारों के अस्तित्व के दौरान ही क्षेत्रीयता की माँग जोर पकड़ती है। क्षेत्रीय दल केंद्र से क्षेत्रीय मुद्दों पर समझौता करके गठबंधन सरकार का समर्थन करते हैं। अनेक बार ऐसा हुआ है कि केंद्र सरकार, जिसमें किसी एक दल का प्रभाव होता है, राज्य के विरोधी दलों की सरकारों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है। अतः केंद्र एवं राज्य दोनों को सहयोगी रुख अपनाकर क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान करने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त इस समस्या के निराकरण के लिए राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण करना भी आवश्यक है। साथ ही प्रत्येक क्षेत्र के आधारभूत ढाँचे का विकास कर राजनेताओँ के राजनीतिक स्वार्थ पर प्रतिबंध लगाना तथा जनसामान्य को शिक्षित एवं जागरूक बनाकर उनमें विश्व बंधुत्व की भावना जगाना भी जरूरी है। स्वतंत्रता के साथ ही हमने एक विभाजन का दर्द झेला है, अब हम पुनः किसी विभाजन को बर्दाश्त नहीं कर सकते, इसलिए हमें एकजुट होकर इस देश को सशक्त एवं सनातन रूप से जीवंत और जागृत रखना होगा। इन उद्देश्यों को पूरा करना तब ही संभव होगा जब हम क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों को देशद्रोही मानकर उनका दमन करेंगे। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतंत्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे।
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